कोविड-19 वैश्विक महामारी की 5 हिम्मती महिलाएं

प्रसिद्ध संगठनों द्वारा कोविड -19 के खिलाफ जंग में कई महिलाएं फ्रंटलाइन वारियर्स के रूप में उभर रही हैं और कमज़ोर लोगों की मदद करने के लिए अलग-अलग तरीकों से गांवों में बिना कोई ढिंढोरा पीटे शांति से काम कर रही हैं.

कोविड-19 वैश्विक महामारी की 5 हिम्मती महिलाएं

जब से इस साल मार्च में देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई, तब से कोविड-19 वायरस के खिलाफ छिड़ी जंग को हज़ारों कोरोना वारियर्स के योगदान के साथ ताकत मिली. ख़ास तौर पर महिलाओं ने इस मुश्किल घड़ी में, बेसहारा लोगों की मदद करने के लिए शानदार कदम उठाए हैं. उन्होंने सहानुभूति और दयालु भाव के साथ, वायरस के खिलाफ भारत की इस जंग में बहुत धैर्य और साहस का प्रदर्शन किया है - न केवल सामने रहकर बल्कि पीछे भी अपनी ज़िम्मेदारियाँ संभाल कर.

यहां ऐसी ही कुछ प्रेरणादायक महिलाओं के बारे में बताया गया है जिन्होंने मानव स्वास्थ्य और समाज के भले के लिए, उन्हें कोरोनोवायरस के घातक असर से बचाने के लिए रात-दिन काम किया.

मीनल दाखावे भोसले 

पुणे स्थित डायग्नोस्टिक कंपनी माइलैब की एक वायरोलॉजिस्ट और आरएंडडी प्रमुख मीनल दाखावे भोसले ने मार्च में भारत की पहली कोविड टेस्टिंग किट विकसित की - यह वो समय था जब देश में दुनिया के मुकाबले टेस्टिंग रेट सबसे कम था. उन्होंने केवल छह हफ़्ते में पैथोडिटेक्ट नाम की कोरोनावायरस टेस्ट किट विकसित की, और वो भी अपने बच्चे को जन्म देने के कुछ घंटे पहले! और गर्भावस्था की मुश्किलों के साथ अस्पताल छोड़ने के कुछ ही दिनों बाद, मीनल ने फरवरी में कार्यक्रम पर काम करना शुरू कर दिया. अपनी खुद की स्वास्थ्य स्थिति के बावजूद, उन्होंने नौकरी को प्राथमिकता दी और अपना काम जारी रखा. इस तरह, वो राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल के दौरान देश और देशवासियों की सेवा में लगी रहीं. टीम के 10 सदस्यों की सहायता से, मीनल ने एक सस्ती किट बनाने में अहम भूमिका निभाई, जो कि ढाई घंटे में वायरल संक्रमण का पता लगाती थी, यह उन किट्स की तुलना में कम था क्योंकि इंपोर्ट की गई किट से इसमें 6-7 घंटे लगते थे. इससे टेस्टिंग तेज़ी से करना और तुरंत उपचार दिलाना संभव हो गया. 

अनुराधा भोसले

अनुराधा भोसले, कोल्हापुर में अवनी फाउंडेशन की प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर के रूप में 1995 से कूड़ा बीनने वाले समुदाय के कल्याण में जुटी हैं. उनकी संस्था न केवल महाराष्ट्र सरकार के फंड से चलने वाले किचन के माध्यम से लोगों को आश्रय और भोजन देती है बल्कि कूड़ा बीनने वाले लोगों और उनके बच्चों की शिक्षा के अधिकारों के लिए भी आवाज़ उठाती है. कूड़ा बीनने वालों का भी समाज में अहम योगदान है. भले ही उन्हें अनदेखा किया जाता रहा हो, लेकिन महामारी के खिलाफ इस जंग में ये पैदल चलने वाले सिपाही से कम नहीं हैं. चूंकि महामारी के दौरान कचरा उठाना घातक वायरस के संपर्क में लाता है, इसलिए अनुराधा ने उन्हें मास्क, दस्ताने और अन्य सुरक्षात्मक गियर दिलवाए ताकि उनकी सुरक्षा का पुख्ता इंतज़ाम किया जा सके. इसके अलावा, वह 2200 परिवारों की मदद करने के उद्देश्य से पैसे जुटाने के लिए 400 से भी ज़्यादा परिवारों से संपर्क किया है.  

सुजाता कार्तिकेयन

जब COVID-19 के मामले ओडिशा में तेज़ी से बढ़ रहे थे, तब सुजाता कार्तिकेयन के नेतृत्व में मिशन शक्ति विभाग ने बचाव की ज़रूरत को महसूस किया और मास्क बनाने का काम शुरू किया. मिशन शक्ति ने पूरे ओडिशा में महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की शुरुआत की, ताकि समुदाय और डॉक्टर्स की रक्षा के लिए बड़े पैमाने पर मास्क का उत्पादन शुरू किया जा सके. लगभग 605 एसएचजी ने 15 लाख कॉटन मास्क बनाए हैं, और लगभग 7000 एसएचजी एसेंशियल और फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए सुरक्षा गियर का उत्पादन करने के लिए चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं. सुजाता के मार्गदर्शन में, मिशन शक्ति की 6700 से अधिक महिला कर्मचारी, स्थानीय अधिकारियों के सहयोग से 5000+ निःशुल्क सामुदायिक रसोई चला रही हैं. उन्होंने ग्रामीण इलाकों में 3.27 लाख लोगों को और 108 शहरी जिलों में 25,000 लोगों को मुफ्त भोजन देने का काम किया है.

टीना डाबी

टीना डाबी एक आईएएस अधिकारी हैं, जिनकी संभावित कोरोनावायरस हॉटस्पॉट के लिए कन्टेनमेंट स्ट्रेटेजी, महामारी के खिलाफ जंग में भारत की शुरुआती सफलताओं में से एक बन गई. टीना, राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की एक सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट, ने कन्टेनमेंट स्ट्रेटेजी तैयार की और वायरस के प्रसार को युद्धस्तर पर कम से कम करने में अहम भूमिका निभाई. उनकी टीम ने रोज़ाना 18-20 घंटे काम किया, ताकि संदिग्ध मामलों को सुलझाया जा सके और उनका इलाज किया जा सके. इसका उद्देश्य यह था कि पूरी आबादी का सर्वे हो सके और पक्के तौर पर उनकी जांच हो.  टीना और उनकी टीम के प्रयासों का ही असर था कि 11 मई को केवल एक सक्रिय मामला दर्ज हुआ. वायरस के प्रसार के खिलाफ उनके क्विक एक्शन की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना की गई, और उनकी इस रणनीति को देश के अन्य हिस्सों में भी एक मॉडल के रूप में अपनाया जा रहा है. 

केके शैलजा

‘कोरोनावायरस को मात देने वाली' के रूप में पहचानी जाने वाली केरल की स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा को उनके प्रभावी प्रबंधन और नेतृत्व के लिए विश्व स्तर पर सराहना मिली है, और वो सफलतापूर्वक अपने राज्य में इस प्रकोप से निपटने और मामलों को शून्य पर लाने में सफल रही हैं. संयुक्त राष्ट्र ने भी उनके प्रयासों के लिए उन्हें सम्मानित किया है. उन्हें निपाह वायरस पर काबू पाने का अनुभव हासिल था, इसलिए पूर्व शिक्षिका रह चुकी शैलजा ने COVID-19 महामारी के खिलाफ बिना समय गंवाए कार्रवाई की. देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा से काफ़ी समय पहले, उनकी सरकार ने स्थिति से निपटने के लिए एक कंट्रोल रूम शुरू किया, लोगों को आइसोलेट करने की योजना बनाई, जिसमें होम क्वारंटाइन भी शामिल था, और एन95 मास्क, और पीपीई इक्विपमेंट सहित अन्य ज़रूरत के सामानों की उपलब्धता भी सुनिश्चित कराई. रोगियों के लिए सही सरकारी अस्पतालों, उच्च-तकनीकी सुविधाओं और रोगी के खर्च को कम करने की उनकी तीन-सूत्रीय रणनीति ने केरल हेल्थकेयर सिस्टम को मज़बूत किया और सफलतापूर्वक इस पर काबू पाया.

और आखिर में

हालांकि प्रमुख पदों पर मौजूद महिलाओं ने वायरस से इस जंग में एक प्रमुख भूमिका निभाई है, लेकिन हमें कई ख़ामोश कोरोना वारियर्स की कड़ी मेहनत और सेवा को नहीं भूलना चाहिए. नर्सों, महिला स्वच्छता कार्यकर्ताओं, फल-और-सब्जी विक्रेताओं, और कई अन्य क्षेत्रों की महिलाओं ने इस सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के दौरान लाखों भारतीय नागरिकों के कल्याण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है.