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सब्सिडी भारत के लिए सही है, या गलत? यह केवल गरीबों की मदद करती है, या केवल अमीरों की?

Are subsidies good or bad for India

सब्सिडी भारत के लिए सही है, या गलत? यह केवल गरीबों की मदद करती है, या केवल अमीरों की? कभी-कभी तो यहां तक कह दिया जाता है कि तथाकथित "सब्सिडी की संस्कृति" सुस्ती को बढ़ावा देती है?

सब्सिडी को लेकर कई सवाल उठते हैं लेकिन इन सब सवालों का सही जवाब पाने के लिए आपको शायद सबसे पहले आत्मावलोकन के तौर पर एक सवाल का जवाब तलाशना चाहिए: "मेरे कितने रिश्तेदारों और दोस्तों को सब्सिडी वाली उच्च शिक्षा से फायदा पहुंचा है?"

यह देखना चाहिए कि सरकारी मेडिकल कॉलज से स्नातक करने के बाद उनमें से कितने डॉक्टर बने हैं। पता है, उन्हें इसके लिए फीस के तौर पर प्रति वर्ष केवल 6,000 रुपये (एम्स, दिल्ली) ही भुगतान करने पड़े हैं, जबकि निजी कॉलेज में इसी कोर्स के लिए कई लाख खर्च करने पड़ते? इसी तरह की शुल्क-रियायती शिक्षा का फायदा उठाते हुए कितने इंजीनियर्स बने हैं? यहां तक ​​कि यहां के कुछ शीर्ष कॉलेजों (प्रेसिडेंसी, कोलकाता) में महज 2,000 रुपये की सालाना फीस लेकर ऐसी शिक्षा दी जाती है जिसके बाद छात्र को किसी अमेरिकी कॉलेज में प्रवेश लेने पर छात्रवृति मिलती है। इस तरह की शिक्षा लेकर तकरीबन 1,30,000 भारतीय छात्र आज अमेरिकी कॉलेजों में पढ़ रहे हैं। लेकिन, यह देखना दिलचस्प होगा कि सब्सिडी वाली कॉलेज शिक्षा और छात्रवृति से फायदा उठाने वाले कितने छात्र अमेरिका से वापस लौटते हैं- और कितने अमेरिकी नागरिकता पाने के लिए वहीं रुक जाते हैं।

लेकिन सबसे पहला सवाल है कि सब्सिडी क्यों दी जाती है? भारत में आबादी का पांचवां हिस्सा आधिकारिक गरीबी रेखा से नीचे जीने को मजबूर है। इसलिए यहां कई कारणों से और विभिन्न क्षेत्रों में सब्सिडी दी जाती है।

मोटे तौर पर, हम कह सकते हैं कि दैनिक इस्तेमाल वाले सामान जैसे भोजन और ईंधन को कम दामों पर मुहैया कराने के लिए सब्सिडी दी जा सकती है। इसके अलावा, सब्सिडी का मकसद सस्ती शिक्षा देकर पढ़े-लिखे भारतीयों का एक रोजगार पूल बनाना हो सकता है जो कि देश के आर्थिक विकास में अपना योगदान दे सकें। साथ ही कर छूट के जरिये चुनिंदा क्षेत्रों या कम विकसित क्षेत्रों को बढ़ावा देकर औद्योगिकीकरण को मजबूती प्रदान करना सब्सिडी का लक्ष्य हो सकता है।

सब्सिडी सही है या गलत, इसका कोई संक्षिप्त और सटीक जवाब नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है किस सब्सिडी के बारे में बात की जा रही है। अगर "नैतिकता" के लिहाज से सब्सिडी पर चर्चा करने से बहुत साफ-साफ तस्वीर उभर कर सामने नहीं आएगी। इस पर "आर्थिक" नजरिये से बात करने की जरूरत है। चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि ’जिस मकसद से सब्सिडी की व्यवस्था की गई थी, क्या वह उस मकसद में कामयाब हो पा रही है? हम और आप जो कर देते हैं, सब्सिडी की रकम आखिरकार उसी से तो आती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसीलिए इस बात पर जोर देते हैं कि सब्सिडी श्रृंखला में जो खामियां हैं उसे दूर करने की जरूरत है, नीति को बंद करने की नहीं।

कई अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने ईंधन सब्सिडी के दुरुपयोग की ओर इशारा किया है।

ईंधन पर रियायतें

ईंधन सब्सिडी से लक्षित लाभार्थियों को किस तरह वंचित किया गया है, इसकी जानकारी वाशिंगटन डीसी के गैर-लाभकारी संगठन ऑयल फॉर चेंज (ओएफसी) ने अपनी एक रिपोर्ट में दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत जैसे विकासशील देशों में बड़ी चालाकी से महंगी वस्तुओं को भी सब्सिडी के दायरे में ले आया गया है। 

ओएफसी ने "फ़ॉसल फ्यूल्स डोन्ट बेनेफिट द पुअर” में लिखा है कि सब्सिडी वाले सामान को अक्सर दूसरे देशों या काला बाजार में बेचा गया या फिर कम प्रभावी कामों में इस्तेमाल किया गया। 

भारत के मामले में ओएफसी ने आम लोगों के बीच कराये एक सर्वेक्षण के आधार पर बताया कि किस तरह सब्सिडी से जरूरतमंदों को फायदा नहीं मिल पा रहा है। यह सर्वेक्षण दिल्ली स्थित गैर लाभकारी संस्था वसुधा फाउंडेशन ने कराया था। फाउंडेशन ने आठ राज्यों के लोगों से पूछताछ के बाद सर्वेक्षण तैयार किया था। सर्वेक्षण में उसने पाया कि "गरीब के कल्याण के लिए तैयार की जाने वाली लगभग सभी नीतियों, सब्सिडी और बजटीय आवंटन का फायदा मुख्य रूप से समाज के समृद्ध लोग उठा रहे हैं। "

ओआईसी ने कहा कि इससे भारत के गांवों का ऊर्जा संबंधित बुनियादी ढांचा लगातार खराब होता गया। 

लोग लंबे समय से बिजली के अलावा कोयला, तेल और गैस सब्सिडी का लाभ उठा रहे हैं। ओएफसी की माने तो इससे केवल 56% आबादी को ही फायदा पहुंच रहा है।   

"गैसोलीन और डीजल सब्सिडी से भी उन्हीं लोगों को ज्यादा लाभ पहुंच रहा है जिनकी खुद की कार या कोई दूसरी गाड़ी है। हालांकि गरीब के पास कार भले ना हो, लेकिन सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल तो वह भी करता है। सार्वजनिक परिवहन में भी उसी ईंधन का इस्तेमाल होता है। उसी तरह किसान भी डीजल सब्सिडी का भरपूर फायदा उठाते हैं। ओएफसी का मानना है कि ईंधन को सब्सिडी के दायरे से बाहर निकाल देना चाहिए।"

ओएफसी का वसुधा के निष्कर्षों के आधार पर मानना है कि ईंधन के दूसरे स्रोतों मसलन, तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) और केरोसिन के मामले में भी ऐसा करना उतना ही सही है। उसके मुताबिक, "शहरी अमीर इन सब्सिडी का सबसे ज्यादा फायदा उठा रहे हैं जबकि ग्रामीण लाभार्थियों द्वारा इसका फायदा उठाने की गुंजाइश काफी कम है।"

अमीर- समर्थक?

मैग्सेसे पुरस्कार विजेता पत्रकार पी साइनाथ ने कुछ साल पहले अपने एक तीखे लेख में कहा था कि 2013-14 के बजट में तत्कालीन भारतीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने सिर्फ सोने, हीरे और आभूषणों पर 48,635 करोड़ रुपये के बकाया सीमा शुल्क को बट्टे खाते में डाल दिया यानी  निरस्त कर दिया।  

साइनाथ का ऐसा मानना था कि बट्टे खाते में डाली जाने वाली यह सबसे बड़ी रकम थी, जिसका आम आदमी से कोई लेना-देना नहीं था। बजट का आंकड़ा देते हुए उन्होंने लिखा था कि, '''' सब्जियों, फलों, अनाजों और वनस्पति तेलों के मामले में जितना बकाया शुल्क बट्टे-खाते में डाला गया था, उससे यह छूट कहीं अधिक थी '''', जो स्थिति को और बदतर बनाती है।

और यह एकमात्र ऐसा उदाहरण नहीं है। 2011-14 की अवधि के दौरान 36 महीनों में सोने, हीरे और आभूषणों पर 1.67 लाख करोड़ रुपये के बकाए शुल्क को बट्टे-खाते में डाला गया था।  

साइनाथ ने बताया कि यूपीए के कार्यकाल 2005-06 से 2013-14 के नौ वर्षों के दौरान अकेले प्रत्यक्ष कॉर्पोरेट आयकर औसतन 7 करोड़ रुपए प्रति घंटा (168 करोड़ रुपए प्रति दिन) निरस्त किया गया यानी बट्टा खाते में डाला गया। उनका कहना है कि हमारे पास केवल उन नौ वर्षों के लिए डेटा है और ऐसा हम केवल कॉर्पोरेट आय कर में देखते हैं।

अगर कोई बकाया सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क को निरस्त किए जाने की बात करे तो यह राशि चौगुनी हो जाती। अगर कॉर्पोरेट सेक्टर के निरस्त किए गए सीमा और उत्पाद शुल्क की बात करें, तो अस्थायी आंकड़ों के मुताबिक यह 5,72,923 करोड़ या 5.32 लाख करोड़ रुपए होता है, इसमें से व्यक्तिगत आयकर अगर निकाल दिया जाए तो। जाहिर है, इसमें लोगों का अपेक्षाकृत व्यापक समूह शामिल था।

साइनाथ बताते हैं कि यह 2012-13 में तेल विपणन कंपनियों द्वारा रिपोर्ट की गई "अंडर रिकवरीज" (ईंधन सब्सिडी) का लगभग चार गुना है।

वांछित सब्सिडी

अब सवाल है कि इसका क्या मतलब निकाला जाए? क्या इसका मतलब यह हुआ कि सभी सब्सिडी गलत स्थानों पर दी जा रही है, और क्या कोई अच्छी सेवा नहीं दी जा रही है? इससे अलग, सार्वजनिक परिवहन पर सब्सिडी ने लाखों लोगों के लिए सस्ती यात्रा मुहैया कराई है।  साथ ही इससे सड़कों पर भीड़ और प्रदूषण कम होने के अलावा पेट्रोल की खपत में भी कमी आई है।

"वांछनीय सब्सिडी" में ग्रामीण रोजगार निर्माण योजना (एनआरईजीए), मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम, स्वास्थ्य सेवा, महिला सशक्तिकरण, गरीबों में शिक्षा के अधिकार के लिए आवंटित धन और कृषि ऋण शामिल किये जा सकते हैं।

संक्षेप में, अगर किसी भी तरह की सब्सिडी से महिलाओं, गरीबों और हाशिए पर के लोगों को फायदा पहुंचता है तो अच्छा है। उनका विकास राष्ट्रीय विकास को आगे बढ़ाने में मदद करेगा। 

चिकित्सा उपकरणों या दवाओं पर सब्सिडी गरीबों की स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित करती है, खासकर भारत जैसे देश में जहां ग्रामीण स्वास्थ्य देखभाल अवसंरचना बिल्कुल ही खराब है। इसके अलावा, फार्मा के लिए नीति प्रोत्साहन भारत को सस्ते उपचार का केंद्र बनाने में मदद करेगा, जैसा कि आईटीईएस सेक्टर में है।

इसी प्रकार, माध्यमिक कृषि पहल के तहत आवंटित ऋणों के लिए सब्सिडी से प्राथमिक कृषि गतिविधियों पर बोझ कम होता है, और साथ ही कृषि क्षेत्र में छद्म बेरोजगारी को भी खत्म करने में मदद मिलती है।

एमएसएमई क्षेत्र किसी भी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी 37% है। यहां सब्सिडी न केवल इस क्षेत्र को मजबूत करेगी बल्कि लाखों लोगों के लिए रोजगार भी सुनिश्चित करेगी।

सार्वजनिक स्थानों और आवासीय क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा उपयोग के लिए सब्सिडी बहुत जरूरी है; सौर सब्सिडी, महंगे उपकरण के आयात पर शुल्क छूट, और जैव-ईंधन जैसे स्वच्छ  ईंधन को प्रोत्साहन से अनुसंधान एवं विकास में निवेश को बढ़ावा मिलेगा और इससे हम  अधिक पारिस्थितिकी-अनुकूल ऊर्जा व्यवस्था की ओर बढ़ेंगे।

अंत में

प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को अपने नए साल के संबोधन में कई अच्छे कदमों की घोषणा की, जो हालांकि बैंकों पर बोझ तो बढ़ाएगा, लेकिन गरीबों और मध्यम वर्ग को इससे काफी मदद मिलेगी। इनमें शामिल हैं:

• नोटबंदी से जमा हुए पैसों का इस्तेमाल गरीबों, युवाओं, बेरोजगारों और उपेक्षित वर्गों को और अधिक उधार देने में किया जाए ताकि उनका भविष्य और अधिक सुरक्षित हो सके

• वरिष्ठ नागरिकों की जमाराशियों पर निश्चित 8% सालाना ब्याज

• किसानों का कर्ज निरस्त करना

• छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए और अधिक ऋण का इंतजाम

• छोटे व्यवसायों के लिए बढ़ी हुई क्रेडिट गारंटी

• 9 लाख रुपए तक के आवास ऋण पर ब्याज दर में 4% की छूट, और

• 12 लाख रुपए तक के आवास ऋण पर ब्याज दर में 3% की छूट

इसके अलावा, हर गर्भवती महिला को उसके बैंक खाते में 6,000 रुपये मिलेंगे। यह घोषणा 2013 के खाद्य सुरक्षा अधिनियम के वादे को आगे ले जाता है।

हालांकि इसको लेकर सतर्क रहने की भी जरूरत है। इरादे चाहे कितने भी नेक क्यों ना हो, लोगों को सब्सिडी का ज्यादा से ज्यादा फायदा तभी मिलेगा, जब वह पारदर्शी और केंद्रित होगी, साथ ही उसे इस तरह से लागू किया जाए ताकि उसमें कोई खामी ना हो।

मोदी ने हमसे वादा किया है कि वह उस दिशा में काम करेंगे। अब हमें बस इंतजार करना है!

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