डिजिटल प्रवाह किस प्रकार महिलाओं के कार्यस्थलों पर लिंग अंतर को बंद करने में मदद कर सकता है

डिजिटल करके भारतीय कार्यस्थलों पर लिंग अंतर को बंद किया जा सकता है। जानने के लिए पढ़ें, कैसे

डिजिटल प्रवाह किस प्रकार महिलाओं के कार्यस्थलों पर लिंग अंतर को बंद करने में मदद कर सकता है

विश्व बैंक द्वारा प्रकाशित 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार,131 देशों में से भारत महिलाएं कार्यबल में भागीदारी में 120 वें स्थान पर है। केवल 27% भारतीय महिलाएं ही कार्यबल का हिस्सा थीं, जो बांग्लादेश (28% से अधिक), श्रीलंका (36%), और नेपाल (80%) से भी कम है।

कोई यह मान सकता है कि उदारीकरण और मिल्लेनियम के बाद, भारतीय कार्यस्थलों में महिलाओं की संख्या बढ़ गई होगी। लेकिन आंकड़ों से पता चलता है कि 2005 और 2012 के बीच लगभग २ करोड़ महिलाएं कार्यस्थल से बाहर हो गईं। इसे परिप्रेक्ष्य में समझे तो , यह श्रीलंका की पूरी आबादी के बराबर है!

दुर्भाग्य से, भारतीय महिलाएं देश की जी.डी.पी. में केवल 17% का योगदान देती हैं, जबकि चीन में महिलाएं 40% के करीब योगदान करती हैं।

अंतर को बंद करने के लिए एक डिजिटल पुल का उपयोग करना

इस अंतर को बंद करने का एक तरीका महिलाओं में डिजिटल कौशल विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना है। डिजिटल तकनीकों का उपयोग करके डिजिटल कौशल का विकास किया जा सकता है, जैसे कि स्मार्ट उपकरणों और टैबलेट सहित डिजिटल उपकरणों के साथ वर्चुअल कार्यप्रणाली का काम , सहयोग उपकरण, संचार प्लेटफ़ॉर्म, और एस.ए.ए.एस. उत्पाद आदि ।

डिजिटल होने से कैसे मदद मिल सकती है

भारतीय महिलाएं एक अनोखी स्थिति में हैं। हालांकि महिला साक्षरता लगातार बढ़ रही है, पर श्रम शक्ति में महिला भागीदारी कम होती जा रही है। कुछ कारणों में समाजशास्त्रीय कारक शामिल हैं जैसे कि भारतीय शहरों में महिलाओं के बीच देर तक काम करने का डर, और कई महिलाएं बच्चो की देखभाल में कमी के कारण छोड़ देती हैं। परिवारों द्वारा आयोजित रूढ़िवादी विचार भी महिलाओं के लिए गतिशीलता को बाधित करते हैं।

इन मान्यताओं को बदलने में समय लग सकता है, लेकिन इस बीच, डिजिटल होने से महिलाओं को अधिक कमाने में मदद मिल सकती है। डिजिटल प्रवाह हासिल करना महिलाओं को घर से काम करने और उत्पादक बने रहने में सक्षम बनाता है। यह उन्हें काम और घर के बीच बेहतर संतुलन बनाए रखने में सक्षम बनाता है। यहां तक कि स्व-नियोजित महिलाएं ऑनलाइन बाज़ार से अधिक उत्पादों को वैश्विक दर्शकों को बेच सकती हैं।

यदि कोई डिजिटल कौशल का लाभ उठाता है, तो नौकरियों तक पहुँच 500% से अधिक बढ़ जाती है। यह एक महत्वपूर्ण आँकड़ा है क्योंकि एक ब्रेक के बाद काम फिर से शुरू करना चाहने वाली 92% भारतीय महिलाओं में से 72% एक ही नियोक्ता के साथ काम फिर से शुरू नहीं करना चाहती हैं। डिजिटल कौशल महिलाओं को रोजगार तक पहुंच बनाने में सक्षम बनाता है। अधिक से अधिक महिलाएं नौकरी के साक्षात्कार के लिए खोज और तैयारी के लिए डिजिटल कौशल का उपयोग कर सकती हैं। यह भी पता चला है कि महिलाएं काम खोजने के लिए डिजिटल कौशल का उपयोग करने में ज्यादा बेहतर हैं।

भारत में, 75% एक्स युग और मिलेनियल महिलाएं नेतृत्व के पदों की आकांक्षा रखती हैं। महिलाएं विश्वसनीय ऑनलाइन पाठ्यक्रमों को अपनाकर अपने डिजिटल आत्मविश्वास को विकसित कर सकती हैं। वे ऑनलाइन नेतृत्व प्रशिक्षण सत्र में भाग ले सकते हैं। यह वरिष्ठ प्रबंधन भूमिकाओं को बनाने और सुरक्षित करने के अवसरों को खोलता है।

डिजिटल कौशल वास्तविक इनाम की ओर ले जाते हैं

एक्सेंचर ने एक शोध रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें 31 देशों के 5000 कामकाजी पुरुषों और महिलाओं का मूल्यांकन किया गया। यह निष्कर्ष निकला कि अगर जिस गति से महिलाएं डिजिटल प्रवाह प्राप्त कर रही हैं वह दोगुनी हो जाये, तो विकासशील देशों में 45 साल के भीतर लैंगिक समानता हासिल की जा सकती है, जो की वैसे निराशाजनक 85 साल लगती ।

यदि महिला श्रम शक्ति में 10% की वृद्धि होती है तो भारत की संभावित जी.डी.पी. विकास दर 1.4% या $ 700 अरब तक बढ़ सकती है। कैटालिस्ट द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, शीर्ष प्रबंधन में सबसे अधिक संख्या महिलाएं होने पर कमाई में बेहतर रिटर्न (35% अधिक) और शेयरधारकों को अधिक कुल रिटर्न (34%) देती हैं।

गैलप द्वारा 2014 के एक अध्ययन में विभिन्न उद्योगों - आतिथ्य और खुदरा से संबंधित दो कंपनियों के 800 से अधिक व्यावसायिक इकाइयों से पता चला है कि लिंग-विविध व्यापार इकाइयों ने पुरुषों के प्रभुत्व वाले लोगों की तुलना में 14% अधिक राजस्व उत्पन्न किया।

बिहार से एक वास्तविक जीवन का उदाहरण

स्टीव जॉब्स ने एक बार एक अध्ययन में  विभिन्न प्रजातियों के गति की क्षमता के माप के बारे में बताया। गिद्ध ने एक किलोमीटर चलने के लिए कम से कम ऊर्जा का उपयोग किया और सूची में सबसे ऊपर रहा। मनुष्यों का बहुत  नीचे स्थान रहा। हालांकि, एक साइकिल पर एक व्यक्ति ने सबसे कुशल प्रदर्शन कर समाप्त किया, यहां तक कि गिद्ध को भी पीछे छोड़ दिया। इससे जॉब्स की प्रसिद्ध टिप्पणी हुई  "कंप्यूटर मानव मन की साइकिल है"।

जॉब्स के अवलोकन के कारण बिहार सरकार ने 2007 में एक आदेश के रूप में, स्कूली छात्राओं को साइकिलें वितरित कीं। उस समय यह लोकलुभावन कदम के रूप में देखा गया था जिसके परिणामस्वरूप पांच वर्षों के भीतर छात्राओं के नामांकन में 300% की वृद्धि हुई थी। उसी अवधि के दौरान, 2007 में 25  लाख की तुलना में केवल 10  लाख लड़कियों ने नामांकन वापस लिया था ।

कार्यस्थलों पर डिजिटल कौशल का जो प्रभाव बढ़ती महिला भागीदारी पर पड़ेगा, वह साइकिल के कारण बिहार में बढ़ती महिला साक्षरता या मानव मन पर कंप्यूटर के प्रभाव से कम नहीं होगा। भारत के कार्यस्थल में लिंग असंतुलन को कम करना सामाजिक और आर्थिक प्रगति, दोनों को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है। लिंग वेतन अंतर के मामले में भारतीय महिलाएँ कहाँ खड़ी हैं, इसे समझने के लिए इसे पढ़ें।

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