TomorrowMakers

इस नए वर्ष में, एक ऐसे वर्ष का सपना क्यों नहीं देखना चाहिए, जहां महिलाओं को समान वेतन मिले और वह अपने आपको सुरक्षित महसूस करें ?

Here's what my dream 2018 would look like

जब लोकसभा में ट्रिपल तलाक को अपराध बनाने का विधेयक पारित किया गया और मानुषी छिल्लर को मिस वर्ल्ड का ताज पहनाया गया उस वक्त मैंने तालियाँ बजाई। वहीँ दूसरी ओर, जब भी मैं महिलाओं पर होनेवाली हिंसा के मामलों में वृद्धि होने की खबरें पढ़ती हूँ मुझे हर बार बहुत दुःख होता है।

 

पिछला वर्ष भारतीय महिलाओं के लिए कुछ निर्धारित करनेवाले बहुत सारे क्षणों से भरा था - कुछ अच्छे और कुछ बुरे। आप में से बहुत सारे लोग जब अपने नए साल में किये जानेवाले अपने संकल्पों को बना रहे होंगे,  पर मैं ऐसा नहीं कर रही थी, मैं एक बड़ा चित्र देख रही हूँ - एक भारतीय महिला के लिए आदर्श 2018 वर्ष क्या होना चाहिए ?

 

तो, मैं यहाँ आपको,  एक झांकी दिखा रही हूँ कि 2018 का मेरा सपना कैसा दिखता है :


1. सैनिटरी नैपकिन टैक्स फ्री होगा

माहवारी के लिए कोई विकल्प नहीं है। इसलिए, सैनिटरी नैपकिन हर महिला का मूल अधिकार हैं। हालांकि,  भारत में केवल 12% महिलायें ही सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं। जहाँ हममें से कुछ यह सोचते हैं कि सैनिटरी नैपकिन हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छे नहीं है,  वहीँ हममें से ज्यादातर उन पर खर्च करना झेल नहीं पातीं। और इसके भी ऊपर, सरकार सैनिटरी नैपकिन्स पर 12% कर लगा रही है, जबकि बिंदी, सिंदूर और काजल को टैक्स से छूट दी गई है।

यदि हम सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल ना कर अपने मासिक धर्म में अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रख पाएंगीं,  इससे हमें कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं जैसे - त्वचा का संक्रमण, मूत्र मार्ग में संक्रमण (यूटीआई), योनि में संक्रमण, गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर आदि होने का खतरा हो सकता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि सभी प्रकार के कैंसर में 23%  कैंसर गर्भाशय का कैंसर का होता है जिससे भारतीय महिलायें प्रभावित होती रहती हैं।

 

क्या आप जानते हैं कि विकसित देशों में, सैनिटरी नैपकिन्स और टैम्पोन आवश्यक स्वास्थ्य और स्वच्छता की श्रेणी में आते हैं?  भारत में, सैनिटरी नैपकिन्स - पेन्सिल, तौलिए और क्रेयान्स जैसी "विविध" वस्तुओं की श्रेणी में आते हैं।

मेरा सपना है कि 2018 में, सैनिटरी नैपकिन्स टैक्स फ्री होंगे। किसी भी महिला को मासिक धर्म के खराब स्वास्थ्य के परिणामों का सामना नहीं करना पड़ेगा।


2. महिलाओं को समान वेतन मिलेगा

हमारे देश में, महिलाओं की तुलना में पुरुष 67% अधिक कमाते हैं। इसके अलावा, आप और मैं पुरुषों की तुलना में अधिक समय जिन्दा रहती हैं और कई प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से ( पढ़ें मातृत्व स्वास्थ्य, गर्भाशय ग्रीवा कैंसर आदि) जूझती रहती हैं, जिसका अर्थ है कि हमें एक भरोसेमंद जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा योजना पर निर्भर होना आवश्यक है। यह एक असाधारण कार्य है कि हम, हमें मिलनेवाले इतने कम वेतन में भी बीमा योजना लेने जैसा चमत्कारिक कार्य कर पातीं हैं।

यह समस्या न केवल आम साधारण महिला के साथ हैं, बल्कि उन महिलाओं के साथ भी हैं जो किसी कंपनी की सीईओ हैं, प्रसिद्ध कंपनियों की बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर की जगह पर हैं,  और मशहूर हस्तियां हैं। कई प्रसिद्ध महिलाएं – इंद्रा नूयी से लेकर प्रियंका चोपड़ा तक - सभी ने लिंग के आधार पर वेतन के फरक पर अपनी राय व्यक्त की है। उन सभी ने एक ही सवाल पूछा है - यदि मैं पुरुषों के समान रूप में और उनके जैसा ही काम करती हूं, तो मुझे पुरुषों को जितना वेतन मिलता है उतना क्यों नहीं दिया जाता?

मेरे सपने में 2018 में, महिलाओं को समान वेतन मिलेगा ताकि वे अपनी आर्थिक स्थिति को बनाए रख सकें।


3. महिलाएं एक सुरक्षित वातावरण में रहेंगी

2016 में,  पति द्वारा क्रूरता सहित महिलाओं के साथ मारपीट, हमला और अपहरण जैसे अपराधों की घटनाओं में 2.9% की वृद्धि हुई है। इसके अलावा 2015 में हुए 34,651 बलात्कारों की तुलना में 2016 में 38,947 कुल बलात्कार हुए हैं। और यह भी हो सकता है कि यह वास्तविक स्थिति नहीं है, यह आंकड़े इससे भी बदतर हो सकते हैं क्योंकि बहुत सी महिलायें सामाजिक डर के कारण उनके साथ घटे इस प्रकार के अपराधों की रिपोर्ट दर्ज ही नहीं करती हैं।

सभी महिला कर्मचारियों के लिए सख्त सुरक्षा, पिक अप और ड्रॉप जैसी सेवायें, इस तरह के मामलों से निपटने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट इस प्रकार के एहतियाती उपायों से अपराधों की घटनाओं को कम करने में मदद हो सकती हैं,  लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है, जब तक कि लोगों की मानसिकता में कोई बदलाव ना हो।

मेरा सपना है कि 2018 में, महिलाएं अपना सिर ऊँचा कर और बिना किसी डर के चलती रहेंगीं  ।


4. महिलाओं को उनके कार्यस्थलों पर बेहतर सुविधाएं मिलेंगी

उच्च शिक्षा अखिल भारतीय सर्वेक्षण (2015-16) में बताया गया है कि भारत में उच्च शिक्षा के लिए दर्ज छात्रों की कुल संख्या में लगभग 46%  महिलायें शामिल हैं। इसके अलावा, 2015-16 में एमबीए कोर्स के लिए हर 10 उम्मीदवारों में लगभग चार महिलाएं थीं।

 

टुमॉरो मेकर्स

                                           आईये पैसों के बारे में स्मार्ट बनते हैं  

कॉरपोरेट बोर्ड्स में महिलाओं का प्रतिनिधित्व


पुरुष    महिला
कम्पनी बोर्ड्स के सदस्य    86%    14%
बोर्ड्स कमिटी के सदस्य    89%    11%
कमिटी के अध्यक्ष    91%    9%
कम्पनी बोर्ड्स के अध्यक्ष एवं सह-अध्यक्ष    97%    3%
पूरे वर्ष की औसत आय    रु. 122.22लाख    रु.60  लाख  
सौजन्य - इंडियन एक्सप्रेस

 

जहाँ ये संख्याएं उत्साहजनक हैं, वहीँ महिलाओं के बारे में, उच्च शिक्षा की संख्या हमेशा कर्मचारियों की संख्या की भागीदारी में नहीं बदलती है। बच्चों और परिवार की जिम्मेदारी,   नौकरी में दबाव, परिवार के दबाव आदि जैसे कारणों के कारण महिलाओं को अपने करियर को छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। कुछ संगठनों ने विशेष रूप से डे-केयर सुविधा, मातृत्व अवकाश, स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी सुविधाएं महिलाओं के लिए मुहैया कराई हैं, पर अभी भी इस इस विषय पर एक लंबा रास्ता तय करना है।

 

 

मेरा सपना है कि 2018 में, महिलाओं को उनके कार्यस्थल पर बेहतर सुविधाएं मिलेंगी और वे अपने करियर को ज्यादा प्राथमिकता दे पाएंगीं।

 

संबंधित लेख