जब निवेश के बारे में सोचें, तो कुछ अलग सोचें

उदारीकरण के बाद से भारतीय बाज़ारों में बड़े बदलाव आए हैं, और इसलिए निवेशकों के लिए कई विकल्प भी खुल गए हैं। निवेश विकल्पों के संबंध में कुछ हटकर सोचना रिटर्न को ज्यादा से ज्यादा करने में मददगार साबित हो सकता है।

Investment options beyond the mainstream

जब बात निवेश विकल्पों की आती है, ज्यादातर लोगों का झुकाव बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट की तरफ हो सकता है। सोने और रियल एस्टेट के अलावा बैंक FDs को पसंद किया जाता है। अगर FDs में निवेश की आसानी और सुरक्षा को छोड़ दें, तो इसमें और कुछ खास बात नहीं है।

गिरती ब्याज दरें और ऊंची महंगाई के दौर में, फिक्स्ड डिपॉजिट में पैसा लगाने का कोई औचित्य नहीं है। इसके अलावा, टैक्स के नजरिए से भी FD बेहतर नहीं है। उदारहण के तौर पर, सबसे ऊपरी टैक्स स्लैब वालों के लिए टैक्स के बाद FDs का वास्तविक रिटर्न 4-5% रह जाता है। तो अब, रिटेल निवेशकों के लिए निवश हेतु अन्य क्या विकल्प उपलब्ध हैं?

फिजिकल एसेट्स (भौतिक संपत्ति)

प्रॉपर्टी और सोने में निवेश पुराने समय से लोकप्रिय रहे हैं। हालांकि यहां सीमा से अधिक निवेश पर पाबंदी, और खरीद-बिक्री में मुश्किलों की वजह से ये निवेश विकल्प अपनी चमक खो रहे हैं। कमोडिटी में निवेश हाल में मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर लिस्टेड फाइनेंशियल डेरिवेटिव प्रोडक्ट्स के जरिए बढ़ा है। मौजूदा समय में, सोना-चांदी, मेटल, एनर्जी, ऑयल और एग्री प्रोडक्ट्स में वायदा में कारोबार होता है।

मानदण्ड रियल एस्टेट सोना कमोडिटी
असल रिटर्न कम-मध्यम कम मध्यम
जोखिम(रिटर्न) मध्यम ज्यादा काफी ज्यादा
सुरक्षा मध्यम काफी कम मध्यम
टैक्स बचत कम कम कम

* टैक्स बचाने का काम काफी जटिल है। किराये से होने वाली आमदनी पर टैक्स नियम इस पर निर्भर करता है कि आपके पास कितनी प्रॉपर्टी है। बिक्री करने पर तभी टैक्स छूट दी जाती है, अगर रियल एस्टेट में वापस से निवेश या खास बॉन्ड में कई सारी शर्तों के साथ निवेश किया जाए।

फाइनेंशियल एसेट्स (वित्तीय संपत्ति)

फाइनेंशियल एसेट्स में दो मुख्य श्रेणियां हैं, फिक्स्ड इनकम और इक्विटी।

  • फिक्स्ड इनकम

फिक्स्ड इनकम में FD की जगह कई विकल्प मौजूद हैं। छोटी बचत योजनाएं यानी स्मॉल सेविंग्स स्कीम्स (SSS) में PPF, पोस्ट ऑफिस सेविंग्स, नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट और अन्य योजनाएं जैसे बेटी के लिए सुकन्या समृद्धि, सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम्स आदि। टैक्स-फ्री बॉन्ड PSU या फिर योग्य एजेंसियों द्वारा जारी की जाती है। ये निवेश विकल्प सरल होने के साथ सुरक्षित भी हैं। डेट म्यूचुअल फंड्स का निवेश थोड़ी लंबी अवधि वाले कॉर्पोरेट बॉन्ड में होता है। जहां डिफॉल्ट और लिक्विडिटी का जोखिम रहता है, साथ ही रिटर्न में भी काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। लिक्विड म्यूचुअल फंड छोटी अवधि वाली सिक्योरिटीज (प्रतिभूति) में निवेश करते हैं, जहां उतार-चढ़ाव तो ज्यादा नहीं होता, लेकिन थोड़ा जोखिम होता है। फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान (FMPS) बॉन्ड, सिक्योरिटीज (प्रतिभूतियां), कॉर्पोरेट डिपॉजिट में निश्चित अवधि के लिए निवेश करते हैं और अवधि के अंत में निवेशकों को भुगतान किया जाता है। इनमें अनुमानित रिटर्न की जानकारी पहले से होती है और प्लान में तय अवधि के लिए लॉक-इन रहता है। म्यूचुअल फंड और फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान से निकलने पर होने वाली आय पर ब्याज के रूप में नहीं, बल्कि कैपिटल गेंस के तौर पर टैक्स लगाया जाता है। ऐसे में टैक्स बचाने के मामले में ब्याज भुगतान वाले निवेश विकल्पों से ये बेहतर होता है।

नीचे दी गई तालिका में अलग-अलग फिक्स्ड इनकम वाले निवेश विकल्पों को दर्शाया गया है। इसमें महंगाई दर 4% मानी गई है।

  • इक्विटी से जुड़े हुए निवेश

इन निवेश के विकल्पों में स्वाभाविक रूप से अप्रत्याशित रिटर्न मिल सकते हैं। हालांकि, अगर सही तरीके से चुना गया और डाइवर्सिफिकेशन सही हो, तो लंबी अवधि में फिक्स्ड इनकम और फिजिकल एसेट में निवेश से काफी ज्यादा रिटर्न मिल सकता है। एक उदाहरण के तौर पर देखें, तो बीएसई सेंसेक्स का 30 साल का CAGR 17% रहा है। इक्विटी में निवेश का अनुभव नहीं है, तो बेहतर होता है कि पेशेवर निवेश सलाहकार की मदद लें। 

मानदण्ड इक्विटी इक्विटी ETFs इक्विटी म्यूचुअल फंड्स
असल रिटर्न का दायरा 12-15% 12-15% 10-13%
जोखिम रिटर्न ज्यादा ज्यादा ज्यादा
सुरक्षा मध्यम मध्यम से ज्यादा मध्यम से ज्यादा
टैक्स बचत ज्यादा ज्यादा ज्यादा

इक्विटी के अंदर, नई कंपनी के शेयर में निवेश का एक और विकल्प मिल जाता है। प्राइमरी मार्केट यानी IPO के जरिए नई कंपनी के शेयर में पैसा लगाया जा सकता है। IPO से पहले प्राइवेट इक्विटी/वेंचर कैपिटल फंड्स के जरिए निवेश किया जा सकता है।

  • यूलिप 

यूनिट लिंक्ड इंवेस्टमेंट प्लांन एक तरह का हाइब्रिड विकल्प है, जिसमें इंश्योरेंस और निवेश दोनों का मिश्रण है। यूलिप में निवेश करने पर फिक्स्ड इनकम और इक्विटी में आनुपातिक निवेश के विकल्प चुनने की सुविधा दी जाती है। यानी यूलिप में आप अपना पैसा इक्विटी और फिक्स्ड इनकम में अपनी जोखिम क्षमता के मुताबिक निवेश कर सकते हैं।

निवेशकों द्वारा भुगतान की गई प्रीमियम राशि का कुछ हिस्सा इंश्योरेंस कवर के लिए इस्तेमाल होता है, और बचे हुए हिस्से का इस्तेमाल अलग-अलग इक्विटी और डेट स्कीम्स में निवेश करने के लिए किया जाता है। निवेशक अपनी जोखिम लेने की क्षमता और रिटर्न की इच्छा के मुताबिक डेट, इक्विटी या हाइब्रिड फंड्स का चुनाव करते हैं। निवेशकों के पास निवेश में बदलाव करने का विकल्प मौजूद रहता है। वो किस एसेट में अधिक पैसा आवंटित करना चाहते हैं, इसका चुनाव कर सकते हैं।

हालांकि टर्म इंश्योरेंस के विपरीत, यूलिप स्कीम्स में कई सारे शुल्क भी जुड़े होते हैं, जो प्रीमियम राशि में से काट लिए जाते हैं। शुरुआत के प्रबंधन खर्च साथ ही सरेंडर/विड्रॉअल शुल्क भी लिये जाते हैं, जो हर इंश्योरेंस कंपनियों के अलग-अलग होते हैं। ऐसे सभी शुल्कों की जानकारी निवेश से पहले पता कर लें।

उदारीकरण के बाद भारत के वित्तीय बाज़ारों में बदलाव के साथ निवेशकों के लिए निवेश के काफी विकल्प भी खुल गए हैं। अगर आप कुछ अलग सोचते हैं, तो अपने रिटर्न को अधिक से अधिक बढ़ा सकेंगे और साथ ही जोखिम घटाने में भी कामयाब होंगे। इसलिए निवेशकों को एक प्रभावी एसेट एलोकेशन करने की जरूरत होती है। यानी कि आप किस एसेट क्लास में कितना निवेश करें ताकि आपको रिटर्न भी बेहतर मिले और जोखिम भी कम उठाना पड़े।

विषय: फाइनेंशियल प्लानिंग, हेल्थ इंश्योरेंस, यूलिप, निवेश, शेयर

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