कोविड-19 के दुष्परिणाम : कौन से सेक्टर संघर्ष करेंगे, कौन से नहीं

जैसे-जैसे विकास के आंकड़े अभी तक के इतिहास में न्यूनतम हो चुके हैं, विभिन्न क्षेत्रों में आगे क्या होगा, इस पर सवाल उठते हैं।

कोविड-19 के दुष्परिणाम : कौन से सेक्टर संघर्ष करेंगे, कौन से नहीं

आधिकारिक आंकड़े आ ही चुके हैं:2019–20 में भारत में 4.2% की फीकी सी वृद्धि हुई है । एक टिपण्णी के रूप में, पिछली तिमाही की विकास दर भी कम हुई है। और यदि संख्या कि बात करें - भारत की तिमाही और वार्षिक वृद्धि दर की - तो रेटिंग एजेंसियों और विभिन्न अर्थशास्त्रियों के अनुमान से अधिक ही देखा गया है, साथ एक चेतावनी थी: इन्हें और संशोधित किया जा सकता है।

सरकार ने 29 मार्च को आर्थिक डेटा जारी करते हुए बताया कि ऐसा इसलिए है क्योंकि ये उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित थे, जो लॉकडाउन द्वारा किए गए गतिविधि के व्यवधान के कारण पूरा नहीं हो पाया था। प्रासंगिक आर्थिक संस्थाओं से डेटा प्रवाह के बाद एक अधिक सटीक तस्वीर सामने आएगी।

जनवरी-अप्रैल 2020

आंकड़े बताते हैं कि फरवरी के अंतिम सप्ताह में कोविड-19 के शुरू होने से पहले ही लम्बे समय से चली आ रही आर्थिक मंदी के कारण भारत की स्थिति खराब हो चुकी थी - पिछले महीने की तुलना में मार्च में आठ प्रमुख उद्योगों की वृद्धि दर 9% कम हुई।

लेकिन जैसा कि घटनाओं से पता चलता है, मार्च में घोषित लॉकडाउन ने डेस्क कि आर्थिक स्थिति को एक और भारी झटका दिया, जो कि एचएसबीसी के चीफ इंडिया अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी के अनुसार, जनवरी और फरवरी के लाभ को मिटा देगा। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल में इन समान आठ प्रमुख उद्योगों की वृद्धि दर और भी अधिक गिर गई - 38% से अधिक, जैसा कि नीचे बताया गया है:

  • सीमेंट: 86%
  • स्टील: 84%
  • रिफाइनरी: 24.2%
  • बिजली: 22.8%
  • कोयला: 15.5%
  • क्रूड: 6.4%
  • उर्वरक: 4.5%

सीमेंट और स्टील के उत्पादन में गिरावट रियल एस्टेट क्षेत्र की कहानी बताती है - दोनों कंपनियों और व्यक्तियों के साथ तरलता के संकेत। फिर भी, आर्थिक गतिविधियाँ वायरस के आने से पहले 2020 की शुरुआत में कर्षण के संकेत दिखा रही थीं, और कुछ कारणों से हमे विश्वास है कि लॉकडाउन समाप्त होने के बाद कुछ क्षेत्रों में सुधार ज़रूर होगा। लेकिन, माना जाता है कि अन्य क्षेत्र कुछ समय के लिए थम जाएंगे।

आइए देखें कि किस क्षेत्र में विकास हो सकता है, और किस में नहीं।

साल के अंत तक

कुछ क्षेत्र जो वित्तीय साल के अंत तक वापस उभरने की संभावना रखते हैं, वे हैं फिनटेक कंपनियां, ई-कॉमर्स, लॉजिस्टिक्स, फार्मा और ऑटो। उन सभी क्षेत्रो की बाद में चर्चा की जाएगी जिनकी संभावना है कि वे आगे भी संघर्ष करेंगे ।

  • ई- कॉमर्स

मार्च 2020 की एक रिपोर्ट में, इंडिया ब्रांड इक्विटी फ़ाउंडेशन ने अनुमान लगाया कि देश में ई-कॉमर्स सेक्टर वर्तमान की स्थिति अनुसार 38.5 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2026 तक $ 200 बिलियन तक बढ़ जाएगा।

लंदन स्थित डेटा एनालिटिक्स फर्म ग्लोबल-डाटा और भी अधिक आशावादी है - और यह केवल महामारी के कारण है। उनका कहना है ,“कोविड-19 प्रकोप के कारण भारतीय उपभोक्ता के लिए खरीद व्यवहार पर अधिक प्रभाव पड़ेगा जिससे उन पर ई-कॉमर्स को अपनाने का दबाव बढ़ेगा ”। नतीजतन, इसका मानना है कि कोविड -19 और लॉकडाउन के कारण ई-कॉमर्स सेक्टर 2023 तक 7 ट्रिलियन तक के बाजार तक पहुंच रहा है, जिस कारण 2019 और 2023 के बीच 19.6% का सी.ऐ.जी.आर. दर्ज होने जा रहा है।

ग्लोबल-डाटा का कहना है कि उपभोक्ता घर पर रहना पसंद कर रहे हैं और ऑनलाइन चैनलों पर निर्भर हो रहे हैं। वर्तमान लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन होने वाला खर्च बढ़ रहा है,जिससे आंशिक रूप से उपभोक्ता खर्च में आयी समग्र गिरावट की भरपाई हो रही है। अमेज़न, ग्रोफ़र्स, बिग बास्केट, फ्लिपकार्ट, पेटीएम, जोमाटो, स्विगी, और नेटफ्लिक्स जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों के फलने-फूलने की संभावना है, क्योंकि लोग कोविड -19 के लिए एक प्रभावी वैक्सीन मिलने तक भीड़ में जाने से बच रहे हैं।

  • फिनटेक

सी आई आई -डेलॉइट की एक संयुक्त रिपोर्ट जिसका शीर्षक बैंकिंग ऑन द फ्यूचर: विज़न 2020 है- के अनुसार भारत के फिनटेक सेक्टर में 'अभूतपूर्व वृद्धि ’एक अरब से अधिक मोबाइल फोन, 330 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ताओं और 240 मिलियन स्मार्ट फोन के कारण देखी गई थी।

कोविड -19 के बाद, विकास को केवल और आगे बढ़ाया जा सकता है; ई-कॉमर्स के विस्तार के साथ, ग्राहकों के लिए डिजिटल रूप से भुगतान करने में सक्षम होना महत्वपूर्ण हो जाएगा, साथं ही कई ऑनलाइन विपणक दूषित टर्मिनलों के संपर्क से बचने के लिए भौतिक स्थानीय स्टोर को बंद कर देंगे। वास्तव में, ग्लोबल-डाटा का कहना है कि 2020 में ही ऑनलाइन खरीद लगभग 26% बढ़ सकती है।

एसबीआई कार्ड्स एंड पेमेंट्स सर्विसेज का एक बयान पहले से ही इस ओर इशारा करता है: मई के दौरान औसत दैनिक खर्च 175 करोड़ रुपये से ऊपर था। "इस लॉकडाउन अवधि में खुले ऑनलाइन और मर्चेंट आउटलेट के माध्यम से क्रेडिट कार्ड पर खर्च जारी रहा है ," ऐसा उन्होंने कहा।

कुछ अनुमानों से संकेत मिलता है कि यह वास्तव में क्या दर्शाता है: ऑनलाइन भुगतान, जो फिलहाल व्यक्तिगत उपभोग व्यय में 10% से भी कम हिस्सा है, अगले 12 महीनों में बढ़कर 25% से अधिक हो जाएगा , और अगले 3–4 वर्षों में 50% को छूएगा। इन ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा हजारों विक्रेताओं को जो भुगतान किया जाएगा , वह भी डिजिटल हो जाएगा।

जैसे-जैसे अधिक से अधिक उपभोक्ता डिजिटल भुगतान के साथ सहज होते जाते हैं, बैंक, वित्तीय संस्थान और यहाँ तक की बिजली और गैस कंपनियों जैसे राज्य उपयोगिताओं ने भी डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया है। फिनटेक और पेमेंट कंपनियां जो इन समाधानों का समर्थन करती हैं, ई-कॉमर्स कंपनियों के अलावा इनकी भी भारी वृद्धि की संभावना होगी।

  • लोजिस्टिक्स

यह एक ऐसा क्षेत्र है (कम से कम वेयरहाउसिंग और प्रौद्योगिकी फर्मों) जिसे विशेषज्ञों को लग रहा है कि महामारी के बाद सरकार से सहायता मिलेगी क्योंकि इससे निर्यात फिर शुरू होने की कोशिश हो सकती है।

1 जून को लॉकडाउन को आंशिक रूप से हटाए जाने से पहले, 60 दिनों से अधिक लंबे समय तक बंद रहने वाले कारखानों में देखा गया कि कारखानों में गैर-जरूरी सामान का उत्पादन बंद हो गया , डिलीवरी बीच में रस्ते में ही रुक गई या वेयरहाउस में अटकी रही है, और श्रमिक जो भी तरीके अपना सकते थे, उससे अपने घर लौट रहे थे ।

उत्पादन और माल के आवाजाही की गति रुकने के साथ, लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में भारी गिरावट आई; क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के अनुसार, यह संभवतः वित्तीय वर्ष के अंत तक 6-8% की गिरावट का गवाह होगा। आईसीआरए को उम्मीद है कि यह ट्रेंड वित्त वर्ष 2020 की चौथी तिमाही और चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी जारी रहेगा ।

उम्मीद है कि सरकार अब राष्ट्रीय लोजिस्टिक्स नीति को प्राथमिकता देगी, जिसमें 6500 से अधिक बुनियादी ढाँचे वाली परियोजनाओं के लिए नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन के लिए 100 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय की परिकल्पना की गई है।

  • फार्मा

भारत के फार्मास्यूटिकल्स बाजार में दो विशिष्ट विशेषताएं हैं: पहला, इसकी ब्रांडेड जेनरिक 70-80% इकठ्ठा करता है; दूसरा, तीव्र प्रतिस्पर्धा और एक राज्य-विनियमित मूल्य नीति ने कीमतों को कम रखा है।

फार्मा कंपनियों को भारी मात्रा में ड्रग्स खरीदना पड़ता है और सरकार द्वारा तय दरों पर अपने अंतिम उत्पादों को बेचना पड़ता है, जिससे वेफर की तरह प्रॉफिट मार्जिन बिलकुल पतली रह जाती है । और केवल मूल्य-नियंत्रित दवाओं की सूची बढ़ती जा रही है - जो 1995 में 74 से बढ़कर 2019 में लगभग 860 हो गई है। इसका मतलब यह है कि विश्व स्तर पर, भारत वॉल्यूम के मामले में तीसरे स्थान पर है, लेकिन मूल्य के मामले में दसवें स्थान पर है।

2019 के पिछले कुछ महीने विशेष रूप से बुरे रहे है, जिसमें चीन से कच्चे माल के आयात में 50% की वृद्धि देखी गई है।लेकिन यहाँ एक उम्मीद की किरण दिखाई दी है : भारत वैश्विक दवाओं का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है, जो वैश्विक बाजार का लगभग 18% नियंत्रित करता है। और तो और , यह दुनिया की लगभग 50% वैक्सीन की मांग को पूरा करता है।

फरवरी के अंत तक महामारी के भारत में फैलने से पहले, आई.सी.आर.ए. ने स्थानीय मांग को देखते हुए वित्त वर्ष 2021 में घरेलू फार्मा सेक्टर की वृद्धि दर को 10–13% बनाए रखने का अनुमान लगाया था। साथ ही, अमेरिकी बाजार के लिए मूल्य निर्धारण का दबाव भी समाप्त कर दिया था ।

2021 से आगे का भविष्य भी रोशन है, आईसीआरए ने तर्क दिया है: लगभग 62 बिलियन डॉलर मूल्य के छोटे अणुओं वाले ड्रग के पेटेंट बंद किये जाने की उम्मीद है, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका में समग्र जेनरिक बाजार 2022 तक 5.6% की सीएजीआर से बढ़ जाएगा|

  • दो पहिया वाहन

भारत के मोटर वाहन क्षेत्र के लिए अगले वित्तीय वर्ष की पहली छमाही के लिए नज़ारा कुछ सुस्त ही होगा , बोर्ड के विशेषज्ञों का ऐसा कहना है। आईसीआरए के अनुसार, दो पहिया वाहनों के लिए स्थिति स्थिर प्रतीत हो रही हैं - यहां तक ​​कि यात्री कार, वाणिज्यिक वाहन और ट्रैक्टर खंडों की खरीदी में भी कमी दिखाई देगी ।

आईसीआरए के अनुसार, दोपहिया वाहनों के ओईएम की स्थिति अगले 12-18 महीनों के लिए स्थिर लग रही है। यह उस सेगमेंट में चल रही मंदी और बीएसई- VI मानकों में हुए परिवर्तन के कारण होने वाली अनिश्चितता के बावजूद भी ऐसा ही रहेगा। आईसीआरए का पूर्वानुमान से उम्मीद है कि दोपहिया वाहनों के ओईएम का क्रेडिट प्रोफाइल ,कमाई में आयी मामूली गिरावट के बावजूद भी मजबूत बना रहेगा।

इसके अलावा, घरेलू बाजार में मांग में आंशिक रूप से आई कमी, निर्यात में स्वस्थ वृद्धि से संतुलित हो गई है, जो वित्त वर्ष 2020 के पहले आठ महीनों में 6.5% ज्यादा थी।

साल के अंत में गिरावट

अधिकांश क्षेत्र संघर्ष करेंगे, आसार है कि इनमे कुछ प्रमुख ऑटो (यात्री कार, वाणिज्यिक वाहन और ट्रैक्टर), एन बी एफ सी , स्टील, रियल एस्टेट और आतिथ्य भी शामिल होंगे ।

  • एन बी एफ सी

मल्टी-फेज़ लॉकडाउन में जो सेक्टर सबसे ज्यादा भुगतेगा , वह होगा एनबीएफसी, जो एसेट क्लास, कस्टमर की आय , एनबीएफसी के ऑपरेशंस में फील्ड वर्क का स्तर और नगद संग्रहण के अनुपात के आधार पर प्रभावित होगा ।

उन खंडों में से, जिनकी एनबीएफसी फ़िक्र करते हैं, क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का कहना है कि लॉकडाउन का माइक्रोफाइनेंस सेगमेंट पर अधिकतम प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि उधारकर्ताओं की आय सृजन गतिविधियों में आयी बाधा के कारण पुनर्भुगतान प्रभावित होगा|

इसी तरह, किफायती आवास ऋण भी इसके प्रभाव को महसूस कर सकता है क्योंकि यह स्व-नियोजित लोग ही है (जिसकी आय धारा लॉकडाउन से प्रभावित हुई है) जिसमें थोक में उधारकर्ता शामिल हैं। एक समान दृष्टि में देखें ,तो बड़े ऑपरेटरों द्वारा कमजोर कमाई के कारण वाणिज्यिक वाहन ऋणों की चुकौती को भी चोट पहुंचेगी ।

  • यात्री वाहन

ऑटो इंडस्ट्री में डिमांड सामान्य तौर पर कई कारकों के कारण दबाव में आ गई है, जैसे कि तरलता की कमी , फाइनेंसिंग की कमी , ग्रामीण आय में कमी और आर्थिक गतिविधियों में समग्र मंदी ने महामारी ने खरीदार की भावनाओं को प्रभावित किया है , जिससे खुदरा मांग में थोड़ी वृद्धि आयी है ।

परिणामस्वरूप, अगले 18 महीनों में यात्री वाहन क्षेत्र के लिए आई सी आर ए का दृष्टिकोण नकारात्मक है। वास्तव में, उद्योग के अनुमान के अनुसार, मई में यात्री वाहनों की शोरूम बिक्री 37,000 थी, जिसने साल-दर-साल 85% की गिरावट दर्ज़ की । लॉक डाउन के कारण पिछले महीने उत्पादन और डिलीवरी पूरी तरह से रुक गए थे।

अब आई सी आर ए को उम्मीद है कि ये सभी कारक यात्री वाहन ओईएम की कमाई और समग्र क्रेडिट प्रोफाइल पर दबाव डालेंगे। हाल ही में इकोनॉमिक टाइम्स द्वारा आयोजित ऑटो सेक्टर पर एक सेमिनार में, उद्योग के विशेषज्ञों ने इससे मिलता-जुलते बयान में कहा कि वास्तविक विकास 2021 से पहले नहीं देखा जाएगा।

हालांकि, छोटी कारों की मांग बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि लोग अब सामाजिक दूरी बनाए रखने के प्रयास में सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने में संकोच करेंगे। कार ऋण पर कम ब्याज दर भी इस मांग को और सुविधाजनक बनाएगी।

  • रियल एस्टेट

एक और बड़ा क्षेत्र जिसमे अभी गोटा मारना बाकी है,वह अचल संपत्ति क्षेत्र है। इस क्षेत्र को पहले ही 2020 की पहली तिमाही में एक गंभीर झटका लगा था, और फिक्की-नारेडको रियल एस्टेट सेंटीमेंट इंडेक्स द्वारा जाना गया है , उद्योग की मनोदशा अभी तक की सबसे न्यूनतम स्तर पर है।

अन्य निष्कर्ष भी इसकी पुष्टि करते हैं। रियल एस्टेट प्लेटफॉर्म 99 एकड़ के एक इन-हाउस सर्वेक्षण के अनुसार, 53% होमबॉयर्स ने अनिश्चित काल के लिए घर खरीदने के फैसले को स्थगित कर दिया है। इसके अतिरिक्त, सर्वेक्षण में भाग लेने वाले दलालों में से लगभग 74% अब अपने प्रस्ताव के लिए बढ़े हुए मूल्य को कम कर रहे हैं।

एक जेएलएल सर्वेक्षण इसके कारण की ओर इशारा करता है: डेवलपर्स 6.24 लाख इकाइयों की इन्वेंट्री के बिक्री न होने से दुखी हैं, जिसकी कुल कीमत लगभग 3,70,000 करोड़ रुपये है, जो शीर्ष आठ मेट्रो शहरों के आसपास हैं।

  • स्टील

महामारी से पहले की आर्थिक मंदी (और स्वयं महामारी होने पर भी ) ने स्टील सेक्टर को प्रभावित किया है, जिसने रेटिंग एजेंसी 'इंद्रा' - (इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च) को मजबूर कर दिया है कि वह उद्योग पर अपने दृष्टिकोण को संशोधित करके वित्तीय वर्ष 2020-2021 के लिए नकारात्मक दृष्टिकोण पेश करें । यह पहले से स्थिर नकारात्मकता थी।

मामूली मांग के अलावा, लौह अयस्क मूल्य के जोखिमों के कारण मार्जिन के दबाव से भी विकास प्रभावित होगा। "किसी भी महत्वपूर्ण पिक-अप की संभावना नहीं है," एजेंसी ने कहा। यह ये भी उम्मीद करता है कि वित्त वर्ष 2020 में साल-दर-साल में कुल इस्पात मार्जिन में गिरावट होगी, और वास्तव में चौथी तिमाही में निचले स्तर पर रहेगी और वित्त वर्ष 2021 में ठीक-ठाक रहेगा।

यदि वित्त वर्ष 2021 की दूसरी छमाही में मांग मजबूत नहीं होती है, तोइनका मानना है कि नई क्षमता परिवर्धन से कीमतों और क्षमता उपयोग दरों पर और दबाव पड़ सकता है।

  • हॉस्पिटैलिटी

महामारी ने आतिथ्य उद्योग को दुनिया भर में अपंग बना दिया है। सेक्टोरल कंसल्टेंसी एचवीएस ग्लोबल सर्विसेज का कहना है कि यह निस्संदेह सबसे बड़ी हताहतों में से एक है, जिसकी मांग अभी तक के न्यूनतम स्तर पर है।

देश के भीतर वैश्विक यात्रा परामर्श और यात्रा प्रतिबंध का मतलब है कि विदेशी पर्यटक आगमन (एफटीए) - विशेष रूप से घूमने आये यात्री - फरवरी से कम होने शुरू हो गए थे , और एचवीएस का कहना है कि इस खंड से मांग उठने की अभी तो किसी भी समय भी उम्मीद नहीं की जा सकती है"।

ऐसा इसलिए था क्योंकि सर्दियों के मौसम (अक्टूबर-मार्च) - "हमारे उद्योग के लिए मजबूत मौसम" -के लिए बुकिंग का बड़ा हिस्सा गर्मियों के महीनों में किया जाता है, जिसे लॉकडाउन से हानि पहुंची है। एचवीएस ने भारत के होटल और आतिथ्य क्षेत्र की एक रिपोर्ट में कहा, "घटनाओं के कारण फैली अफरा-तफरी का यात्रा पर व्यापक प्रभाव जारी रहेगा।"




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