पेट्रोल, डीजल की कीमत के बढ़ने से आप पर क्या असर हो सकता है?

पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि से होने वाला प्रभाव

पेट्रोल, डीजल की कीमत के बढ़ने से आप पर क्या असर हो सकता है

यह कहा जा सकता है कि इंधन एक आवश्यक वस्तु है, जिसकी कीमत हमारे जीवन के प्रत्येक आयाम को प्रभावित करता है। परिवहन क्षेत्र के एक अभिन्न हिस्से के रूप में इसकी आवश्यकता के कारण ही भारत में पेट्रोल और डीजल कीमतों में वृद्धि का अन्य तमाम सेक्टरों पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है और उसका यहां की अर्थव्यवस्था पर एक गहन प्रभाव पड़ता है।

यह गोपनीय बात नहीं है कि पिछ्ले कुछ वर्षों में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें लगातार बढ़ती रही हैं। पर पिछले कुछ हफ्तों में तो यह काफी तेजी से बड़ी है। इंधन की कीमतों की दिशा पिछले तीन महीनों के दौरान तेजी से ऊपर की ओर रही है। उदाहरण के लिए मुम्बई में नवम्बर 2020 को पेट्रोल की कीमत रु. 87.80 प्रति लीटर थी, जो मार्च 2021 में रु. 97.57 प्रति लीटर हो गई। मुम्बईवासी पेट्रोल के लिए क्यों सबसे ज्यादा कीमत चुकाते हैं, यह जानने के लिए इसे पढ़ें।.

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भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत बढ़ने के कारण

इंधन की बढ़ती कीमतों के कई कारण होते हैं। भारत में पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों पर कोई राय कायम करने से पहले इसके कारणों को समझना उचित होगा।

1. कच्चे तेल की कीमत: प्रति बैरल कच्चे तेल की कीमत में दुनिया भर में वृद्धि हुई है। इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि 4 मई 2020 को कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल $20.39 थी जो 15 मार्च 2021 को बढ़कर $65.39 हो गई। यह तेल से समृद्ध तेल उत्पादक देशों, जिन्हें ओपेक (पेट्रोलियम निर्यात करने वाले देशों की संगठन) द्वारा आपूर्ति के ऊपर निरंतर नियंत्रण लगाने के कारण है। मौजूदा इंधन कीमत में वृद्धि का यही मुख्य कारण है। 

2. इंधन के आयात पर निर्भरता: भारत अपने इंधन की जरूरत का 80% से अधिक आयात करता है। दरअसल यह अमेरिका और चीन के बाद कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक है। अंतर्राष्ट्रीय आयातों पर इस निर्भरता का अर्थ है कि इंधन की कीमत में किसी प्रकार के बदलाव का देश की मौजूदा इंधन कीमतों पर सीधा असर पड़ना है। 

3. डॉलर विनिमय दर: कच्चे तेल के बैरलों की कीमतें यूएस डॉलर में तय की और चुकाई जाती है। विनिमय दर 1 अमेरिकी डॉलर के लिए लगभग 72 रुपए रही है। इस दर का भी असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर काफी प्रभाव पड़ता है। 

4. सरकारी कर: इसके अलावा - भारत सरकार इंधन के ऊपर कर लगाती है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। फरवरी 2021 में पेट्रोल कीमत का ब्रेक-अप कुछ इस प्रकार था: 

आधार मूल्य और फ्रेट ₹32.10
केंद्र सरकार के कर ₹32.90
राज्य सरकार के कर ₹20.61
डीलर कमीशन ₹3.68
खुदरा विक्रय मूल्य ₹89.29

जैसा कि आप देख सकते हैं, सरकार के कर इंधन की अंतिम कीमत का एक बड़ा हिस्सा निर्मित करते हैं। यहां तक कि अतीत में जब कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट हुई तो हमने इंधन की कीमतों में आनुपातिक सुधार नहीं देखा। पिछले तीन महीनों में तेल का विपणन करने वाली कंपनियों का कीमत बढ़ाने के फैसले ने सरकार की बदलती दरों के मुकाबले इंधन की कीमतों को ज्यादा प्रभावित किया है।

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बढ़ती इंधन कीमतों का प्रभाव

1. बजट और आम परिवारों और लोगों के जीवन के ऊपर: एक सर्वेक्षण के अनुसार, 51% उत्तरदाताओं ने माना कि इंधन पर होने वाले खर्चों को प्रबंधित करने के लिए वे अन्य जरूरी खर्चों में कटौती कर रहे थे। औसतन एक टू-व्हीलर हर महीने लगभग 15 लीटर इंधन की ख़पत करता है। फरवरी 2020 में पेट्रोल की कीमत रु. 71.94 प्रति लीटर थी, जबकि मार्च 2021 में यही बढ़कर रु. 97 प्रति लीटर हो गई। इसका अर्थ है कि टू व्हीलर का प्रयोक्ता हर माह पेट्रोल पर लगभग रु. 420 खर्च करेगा। 

ज्यादातर भारतीय परिवार अपने मासिक खर्चों का कड़ाई से बजट बनाता है। इंधन की कीमत में वृद्धि का उनकी जेबों पर सीधा अस्र पड़ता है। इंधन की वृद्धि के आनुपातिक प्रभाव से अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमत में वृद्धि होने पर परिवारों को प्रबंधन करने के तरीके खोजने होंगे।

2. विभिन्न व्यवसायों पर: ऑटो सेक्टर ने पहले ही इंधन की कीमतों में वृद्धि का खामियाजा भुगता है। यात्री वाहनों तथा टू-व्हीलर की बिक्री जनवरी 2021 में नीचे गिर गई है और यह गिरावट आगे भी जारी रह सकती है। यह ऑटो ऐंसिलरी सेक्टर को भी प्रभावित करेगा। 

लॉजिस्टिक्स और परिवहन सेक्टर की कंपनियों ने अपनी दर को 10% से 15% तक बढ़ाने का फ़ैसला लिया है। यह कहने की जरूरत नहीं है, कि जिन अन्य उद्योगों की निर्भरता इंधन पर प्रत्यक्ष रूप से नहीं है, वे भी इंधन की कीमतों में वृद्धि होने के बाद परिवहन लागत के बढ़ने से प्रभावित होंगी। 

नोटबंदी और लॉकडाउंस की दोहरी मार पड़ने के बाद, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एसएमई और एमएसएमई भी इंधन की कीमतों में किसी प्रकार की वृद्धि से काफी प्रभावित होंगे। 

3. आम तौर पर देश की अर्थव्यवस्था पर: इंधन की बढ़ती कीमत हरेक वस्तु की लागत को बढ़ाती है, जिससे सभी सेक्टरों की कीमत में इजाफा होता है। चूंकि हरेक सेक्टर किसी न किसी रूप में परिवहन का इस्तेमाल करता है, परिवहन लागत में इजाफा से समग्र रूप से मुद्रास्फीति जन्म लेती है। चूंकि जॉब मार्केट में अभी तेजी आनी बाकी है, इंधन की कीमतों में वृद्धि से कुछ और समय के लिए रोजगार के स्तर में गिरावट बनी रह सकती है। 

मौजूदा कोविड-19 महामारी के कारण उपजी आर्थिक मंदी के साथ, इंधन की कीमतों में तेजी से वृद्धि ने व्यक्तियों, परिवारों और कंपनियों को प्रभावित किया है। केंद्र सरकार करों में कटौती करने के लिए इच्छुक नहीं है, तो ऐसे में आने वाले समय में आम जनता को और भी कठिन दौर का सामना करना पड़ सकता है। कच्चे तेल के स्टॉक्स:क्या वे निवेश के अच्छे प्रकार है?

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