विवाह के लिए महिलाओं की कानूनी उम्र बढ़ाना: इससे उन्हें क्या फ़ायदा होगा?

भारत में महिलाओं की विवाह योग्य आयु को बढ़ाए जाने पर काम करना, और समाज पर इसका प्रभाव - एक अध्ययन

विवाह के लिए महिलाओं की कानूनी उम्र बढ़ाना: इससे उन्हें क्या फ़ायदा होगा?

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के उस सुझाव का ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम कानूनी उम्र 18 से बढ़ाकर 21 साल करने के बारे में कहा था. 

इसका कोई फ़ायदा भी है? अगर हम भारतीय स्टेट बैंक द्वारा किए गए शोध और जापान, सिंगापुर और चीन जैसे अन्य एशियाई देशों के साथ तुलना की बात करें तो इसका जवाब है हाँ, फ़ायदा तो है.

समतामूलक समाज का निर्माण करने के लिए, जहाँ महिलाओं और पुरुषों को समान अवसर प्रदान किए जाते हैं, यह बहुत ज़रूरी है कि हम महिलाओं और पुरुषों की शादी के लिए 21 वर्ष की उम्र तय करें. इस मान्यता को दुनिया में सभी जगह नकारा जा रहा है कि 'लड़कियाँ लड़कों की तुलना में जल्दी समझदार हो जाती हैं और इसलिए 18 साल की उम्र में उनकी शादी कर देनी चाहिए'.

2015-16 में, भारत में 21 साल से पहले शादी करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 63% था. आइए देखते हैं कि भारत में महिलाओं के लिए शादी की उम्र बढ़ने पर हमारे समाज को क्या फायदे हो सकते हैं.

फ़ायदे

  • महिलाओं को ज़्यादा पढ़ने का मौका मिलेगा और स्नातकों की संख्या वर्तमान 9.8% से बढ़कर 17% या ज़्यादा बढ़ेगी.
  • जब महिलाओं की आवाज़ को अधिक गंभीरता से लिया जाएगा तो इससे समाज में नए विचारों को जगह मिलेगी.
  • इससे मातृ मृत्यु दर (प्रसव के दौरान मरने वाली महिलाओं की संख्या) भी घटेगी. 18 से कम उम्र की कई लड़कियाँ ऐसी जटिलताओं का शिकार होती हैं.
  • इससे दहेज प्रथा पर भी रोक लगेगी क्योंकि ग्रेजुएट होने वाली या स्किल सीखने वाली महिलाएं अपने लिए ख़ुद कमा सकेंगी.
  • समाज में ज़्यादा कामकाजी महिलाओं के होने से गरीबी का स्तर भी घटेगा और अन्य सभी पहलुओं में सामाजिक चेतना बढ़ाने में भी मदद मिलेगी. 

भारत को इसके लिए क्या कदम उठाने चाहिए

यह तो साफ़ तौर पर दिखता है कि सामाजिक तौर पर इसके बहुत फ़ायदे हैं. लेकिन इन फ़ायदों को पाने के लिए, हमें पूरी लगन के साथ एक ऐसे रास्ते पर चलना होगा जिसमें नीचे दी गई बातें शामिल हों:

  • भारतीय परिवारों को इस बारे में बताया जाए कि लडकियों को बोझ नहीं बल्कि लड़कों के बराबर समझा जाए.
  • महिलाओं को दुनिया के क़ाबिल बनने में मदद करने के लिए बहुत से शैक्षणिक संस्थानों और बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं को शामिल किया जाए ताकि वे आगे बढ़ सकें और नए कौशल सीख सकें.
  • पश्चिमी देशों की तरह ही, महिला डोमेन में और प्रोफेशन जोड़ें - जैसे आर्म्ड फ़ोर्स, खेल वगैरह जिनमें वर्तमान समय में ज़्यादातर पुरुष ही मौजूद हैं.
  • सामाजिक सहायता प्रणालियों को संवेदनशील बनाएं: सही मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध कराने, पुलिस, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों की क्वालिटी को बेहतर बनाने के लिए काम करें, और महिलाओं और उनकी ज़रूरतों के बारे में जागरूकता पैदा करें.
  • सभी महिलाओं के लिए राज्य-प्रायोजित बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं प्रदान की जाएं.
  • महिलाओं को अर्थव्यवस्था में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सभी ज़रूरी सुविधाएं उपलब्ध कराएं और उन्हें उद्यमी बनने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करें.
  • गरीबी को जड़ से मिटाना बहुत ज़रूरी है क्योंकि ज़्यादातर गरीब घर की लड़कियां (45%) 21 वर्ष की आयु से पहले शादी कर लेती हैं, जबकि अध्ययनों से पता चला है कि पैसे वाले घर की 10 में से एक महिला (10%) ही कम आयु में शादी करती है.

गरीबी का शादी की उम्र पर असर

सरकार इस बारे में जागरूक है कि महिलाओं को सशक्त बनाने का फ़ायदा समाज को ही होगा, लेकिन यह भी देखा गया है कि कम उम्र में शादी का सबसे प्रमुख कारण गरीबी है. बाल विवाह में एक बड़ी गिरावट हाल ही में हुई है, हालांकि बाल विवाह के खिलाफ कानून 90 साल से अस्तित्व में है. यूनिसेफ की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र की जिन लड़कियों की शादी हो जाती है उनका प्रतिशत लगभग 27% है.

सरकार को गरीबी जड़ से मिटा देनी चाहिए और बाल विवाह या जल्दी विवाह करने पर लगाम कसने के लिए अच्छे स्तर की शिक्षा पर ज़ोर देना चाहिए. साथ ही, मानसिकता, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और महिला सशक्तीकरण से संबंधित मुद्दे भी इसमें एक अहम भूमिका निभाते हैं. इसके अलावा, यह भी देखें कि शादी के बाद अपनी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी को कैसे जारी रखें.