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हालांकि महिलाएं आर्थिक रूप से आगे बढ़ रही हैं , लेकिन पुरूषों को पैसे के मामले में पीछे छोड़ने के लिए उन्हें अभी भी कुछ बाधाओं को पार करना होगा।

When will ​​Personal Finance be the Gender Neutral?

जब जेन- पांच बेनेट बहनों में सबसे बड़ी और सुन्दर बहन- की सगाई अमीर व्यक्ति मिस्टर बिंगले से हुई तो उसके पिता ने खुशी में मजाक करते हुए उससे कहा कि ये युवा जोड़ा ‘हमेशा अपनी आय से आगे रहेगा ’।


इस बात पर जेन ने नपा-तुला जवाब दिया, “मुझे उम्मीद नहीं है। पैसे के मामले में मेरी नासमझी माफ करने लायक नहीं है।”

जेन ऑस्टेन के क्लासिक उपन्यास ‘प्राइड एंड प्रेज्यूडिस’ का यह छोटा सा हिस्सा समाज के भीतर की उस सोच को सामने लाता है जहां माना जाता है कि महिलाएं अपने पैसे का प्रबंध नहीं कर सकती। मजे की बात यह है कि उपन्यास की यह काल्पनिक कहानी आज वास्तविक जिंदगी में बड़े पैमाने पर दोहराई जा रही है- जबकि इस उपन्यास को लिखे 200 वर्ष से ज्यादा का समय हो चुका है। 

इसलिए आज मैं एक प्रश्न पूछ रही हूँ जो हमें 200 वर्ष पहले ही पूछना चाहिए था- पर्सनल फाइनेंस या पैसे के प्रंबधन का क्षेत्र महिला-पुरूष के अंतर से कब मुक्त होगा?


पर्सनल फाइनेंस क्या है? 

साधारण शब्दों में कहें तो पैसे और उससे जुड़ी हर चीज जैसे बैंक अकाउंट, क्रेडिट/ डेबिट कार्ड,कर्ज़, बीमा, योजनाएं, निवेश, टैक्स आदि इसमें शामिल है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है अपने पैसे से जुड़े मामलों में खुद निर्णय लेना। पैसे को संभालने के लिए पैसे से जुड़े मामलों की साधारण समझ होना जरूरी है, जैसे,चेक कैसे जमा करें, बैंक खाता कैसे खोलें या टैक्स रिटर्न कैसे फाइल करें। आप और मैं हम दोनों ही इस बात पर सहमत होंगे कि पैसा हमारी जिंदगी, सपनों और आशाओं का अहम हिस्सा है। हमारे सपनों और आशाओं के बारे में हम से बेहतर कोई नहीं जानता। इसलिए अपने पैसे से जुड़ी जिम्मेदारी अपने माता-पिता, भाई या जीवनसाथी को क्यों दें?


हमारे पैसे का प्रबंधन करने से हमें कौन रोकता है? 

जब हम अपने घर को संभालने और परिवार की जिम्मेदारियों को पूरा करने में व्यस्त थे, हम यह समझ ही नहीं पाए कि पैसे का प्रबंध कब पुरूषों के हाथ में चला गया। उसके बाद हमने घर से बाहर निकलना, नौकरी करना, और पैसे कमाना शुरू किया। उस समय हमें कर्ज़ के लिए अप्लाई करने, बीमा खरीदने और टैक्स रिटर्न फाइल करने की जरूरत महसूस हुई। हालांकि, अभी भी हम में से बहुत सी महिलाएं है जो बच्चों की देखभाल और घर की जिम्मेदारियों को पूरा करने के नाम अपने पैसे को संभालना नहीं चाहती। यह समस्या का केवल एक पहलू है। 

इसका दूसरा पहलू यह है कि बहुत से सर्वेक्षणों से यह पता चला है कि पैसे के मामले में महिलाओं का दृष्टिकोण पुरूषों से अलग होता है। उदाहरण के लिए आस्ट्रेलिया में हुआ एक सर्वे बताता है कि बचत के मामले में महिलाएं पुरूषों से ज्यादा सक्रिय रहती हैं, भले ही उनमें से कुछ उसका सही प्रबंध ना कर पाती हों। यह भी सामने आया कि अधिकतर महिलाओं को बजट बनाने और बचत के मामले में खुद पर विश्वास है। हालांकि, अपनी आय के मामले में उनमें आत्मविश्वास कम था- सर्वे में शामिल 63% महिलाओं ने कहा कि वे पैसे का निवेश कर सकती हैं, लेकिन यह आंकड़ा पुरूषों के 75% के मुकाबले काफी कम है।  

निवेश के मामले में यह अस्थिरता दूसरे सर्वे से भी साबित हुई। इस सर्वे को बीमा कंपनी प्रूडेंशियल इन इंग्लैंड ने किया था। इसमें पता चला कि जहां महिलाओं में अपने वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने को लेकर बहुत कम आत्मविश्वास होता है, वहीं वे वित्तीय निर्णय लेने के मामले में पुरूषों की तुलना में कम इच्छुक होती हैं। प्रूडेंशियल सर्वे बताता है कि पुरूषों की तुलना में दोगुनी महिलाएं खुद को फाइनेंस की जानकारी के मामले में “नौसिखिया” मानती हैं। 

इस व्यवहार के कारण आज महिलाओं और पैसे के बारे में बहुत से मिथक बन गए हैं जैसे महिलाएं कम आत्मविश्वासी होती हैं, जोखिम लेने से बचती हैं, उनमें हिसाब किताब की क्षमता कम होती है। मैं मानती हूं कि महिलाओं के बारे में ये सब मिथक सही नहीं हैं। लेकिन मेरा मानना है कि बहुत से मिथकों से महिलाओं को फायदा ही हुआ है क्योंकि इससे वे खुद को लगातार जानकार बनाए रखने, सलाह या मदद लेने में ना शर्माने और हिसाब किताब मे ज्यादा ध्यान रखने का प्रयास करती हैं। 


महिलाओं को अपने पैसे पर नियंत्रण क्यों रखना चाहिए

बहुत से कारण हैं जो बताते हैं कि हमें अपने पैसे के प्रबंध के लिए दूसरों पर निर्भर रहने की बजाए खुद निर्णय क्यों लेना चाहिए। ये सभी वजहें आपको वित्तीय स्वतंत्रता के लिए प्रेरित करती हैं। यह साबित हो चुका है कि महिलाएं पुरूषों की तुलना में ज्यादा लंबा जीवन जीती हैं, ऐसे में जीवनसाथी के ना रहने पर आपके पैसे की देखभाल कौन करेगा? हमारा पैसा कहां से आता है और कहां जाता है इसकी समझ हमें पैसे के खर्च और बचत के बारे में जागरुक बनाती है।   


अगर आपको लगता है कि खर्च जरूरत से ज्यादा हो रहा है तो इससे आपको फालतू खर्चों पर रोक लगाने में मदद मिलती है। रिटायरमेंट के उन दिनों में जब हमारे जीवनसाथी हमारे साथ ना हों और बच्चे अपने भविष्य बनाने में व्यस्त हो, ये समझ हमारे बहुत काम आ सकती है। 

बजट बनाना, निवेश करना और पैसे का प्रबंध करना ना केवल महिलाओं को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाता है बल्कि आत्मविश्वास भी देता है। हम अपने परिवार के खर्च का प्रबंध करना सीखते हैं और यह समझ बाद में निर्णय लेने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह आत्मविश्वास महिलाओं को किसी खराब रिश्ते से बाहर निकलने का हौसला भी देता है। भारत की चार में से एक महिला घरेलू हिंसा का शिकार है।   हालांकि भारत में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (2005) लाया गया लेकिन हर महिला इसका प्रयोग नहीं करती। बहुत सी महिलाएं अपमानजनक रिश्ते में इसलिए रहती हैं क्योंकि वे आर्थिक रूप से अपने पति पर निर्भर होती हैं। वे अपनी जरूरतों के लिए परिवार पर निर्भर होती हैं जिनमें भोजन और घर जैसी सामान्य जरूरतें भी शामिल हैं, यही वजह है कि वे हिंसक माहौल में रहने के लिए मजबूर हैं। आर्थिक आजादी से हमें उस खराब और हिंसक माहौल से बाहर आने का आत्मविश्वास हासिल होता है। 


… अभी आशा है!

नीलसन से मिले आंकडे बताते हैं कि खुद अपने पैसे के निवेश का निर्णय लेने वाली महिलाओं का प्रतिशत वर्ष 2013 में 23% था जो वर्ष 2016 में बढ़कर 52% हो गया है। बैंकों जैसे वित्तीय संस्थान भी खास महिलाओं के लिए बनी निवेश योजनाएं, बैंक खाते, क्रेडिट/डेबिट कार्ड्स, कर्ज़  आदि लेकर आए हैं। 


अपने तर्क रखने के बाद मुझे लगता है कि यह पूरा मुद्दा एक ही बात पर आकर थमता है और वह है - जागरूकता की कमी। अगर आपको या मुझे यह पता होता कि पैसे का प्रबंध हमारी जिंदगी का इतना अहम हिस्सा है तो हम इसका निर्णय किसी और को कभी नहीं सौपते।


लेकिन जैसा कि कहावत है, देर आए दुरस्त आए। अभी क्या बाकि है? आप और मैं वित्त की दुनिया को जेंडर न्यूट्रल बनाने से कुछ ही आर्थिक कदम पीछे हैं। 

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