भारत में सोने की कीमतों को प्रभावित करने वाले कारण

भारत में सोने की कीमतों पर असर डालने वाले कारणों के बारे में जानें।

भारत में सोने की कीमतों को प्रभावित करने वाले कारण
सोना एक कीमती धातु है और यह भारत में निवेश का पसंदीदा साधन है। सोने की कीमतों पर केवल मांग और आपूर्ति का ही असर नहीं पड़ता बल्कि कई दूसरे कारण भी हैं जिनकी वजह से सोने की कीमतों की भविष्यवाणी करना संभव नहीं हो पाता।

दुनिया भर में कुछ कारण हैं जो सोने की कीमतों पर असर डालते हैं जैसे मंहगाई, सोने की आपूर्ति, केन्द्रीय बैंक का सोने को खरीदने या बेचने का निर्णय, एक्सचेंज ट्रैडेड फंड (ईटीएफ) के द्वारा सोने का व्यापार, आर्थिक स्थिति आदि। आइए एक-एक करके इन सभी पर नज़र डालते हैं:
 
1. महंगाई
आमतौर से देखा गया है कि सोने की कीमतें महंगाई के हिसाब से चलती हैं। जब भारतीय अर्थव्यवस्था में महंगाई आती है और घरेलू मुद्रा कमज़ोर होती है तो लोग सोने में निवेश करना बेहतर समझते हैं जिसके कारण सोने की मांग बढ़ती है।
हालांकि, दोनों के बीच किसी विशेष संबंध का दावा करना गलत होगा। 21वीं सदी के पहले दशक में आई भयानक मंदी से पहले ही सोने की कीमतों में उछाल आ रहा था और स्थिति सुधरने के बाद कीमतें उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थीं। हालांकि सोने की कीमतों ने मंदी के कारण आई महंगाई पर अपनी प्रतिक्रिया दिखाई थी।
 
2. केन्द्रीय बैंक का निर्णय
सोने को खरीदने या बेचने का केन्द्रीय बैंक का निर्णय ( भारत के मामले में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) सोने की कीमतों पर असर डाल सकता है क्योंकि इस लेनदेन में सोने की बड़ी मात्रा शामिल होती है। केन्द्रीय बैंक बड़ी मात्रा में सोने का भंडार बनाए रखता है । इस सोने को अर्थव्यवस्था में उछाल के समय बेच देना चाहिए। सोने को बाज़ार में बेचा जाता है हालांकि दूसरे संस्थागत खरीदार उसे खरीदने के लिए उतना तैयार नहीं होते। इसके कारण जब भी केन्द्रीय बैंक सोने के केन्द्रीय भंडार में कमी करता है तो सोने की कीमतों में कमी होना शुरू हो जाती है।
इस तरह बड़ी मात्रा में खरीद और बिक्री एक्सचेंज ट्रैडेड फंड्स
(उदाहरण के लिए, गोल्ड ट्रस्ट्स और गोल्ड शेयर्स) के द्वारा भी की जाती है और इसका भी बहुत प्रभाव पड़ता है। इस तरह से किए गए लेनदेन से सोने की मांग और आपूर्ति पर असर पड़ता है।
 
3. ब्याज़ दरें
सोने की कीमत और ब्याज़ दरें एक दूसरे के विपरीत चलती हैं। जब ब्याज़ दरों में बढ़ोतरी होती है तो लोग अपना सोना बेचते हैं और उस पैसे से बढ़ी हुई ब्याज़ दरों का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। जब ब्याज़ दरें गिरती हैं तो लोगों को सोना खरीदने में ज़्यादा फायदा नज़र आता है, इसके कारण सोने की मांग बढ़ती है। हालांकि, ऐसा केवल थोड़े समय के लिए ही देखा गया है, लंबे समय में सोने की कीमतों और ब्याज़ दरों दोनों को एक साथ बढ़ते हुए देखा गया है इससे पता चलता है कि लंबे समय में दोनों के बीच सकारात्मक सहसंबंध रहता है। उदाहरण के लिए, 1970 में सोने में उछाल के समय, ब्याज़ दरों के बढ़ने के बावजू़द सोने की कीमतों में तेज़ी देखी गई थी।
 
4.आभूषण बाज़ार
भारतीय पारम्परिक रूप से गहनों के रूप में सोना खरीदते हैं। शादियों और त्यौहारों के समय पूरे भारत में सोना खरीदा जाता है। जिसके कारण त्यौहारों और शादियों के मौसम ( आमतौर से अक्टूबर से दिसम्बर) में सोने की मांग बढ़ जाती है, इस मांग पर सोने की कीमत का प्रभाव नहीं पड़ता। इस त्यौहारी मांग के चलते ही भारत बड़ी मात्रा में सोने का आयात करता है।
 
5.मानसून
भारत में शहरी लोगों के पास सोने के अलावा भी निवेश के बहुत से विकल्प ( रियल एस्टेट, शेयर बाज़ार आदि) हैं। ग्रामीण भारत पारम्परिक रूप से सोने में निवेश करता रहा है। आंकड़ों से भी इसको समझा जा सकता है, भारत में सोने की मांग का 60% हिस्सा ग्रामीण इलाकों से आता है। मानसून अच्छा रहने पर फसल अच्छी होती है और उससे हुई कमाई से सोने में निवेश किया जाता है। इस सोने को मुश्किल दिनों में इस्तेमाल किया जाता है। मानसून अच्छा ना होने पर कमाई कम होती है और ऐसे में पहले खरीदा गया सोना काम आता है।
 
6. रूपये की ताकत
इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि भारत में सोने की अधिकांश मांग आयात से पूरी की जाती है। रूपये की गिरती कीमतों के कारण रूपये की क्रय शक्ति में कमी आती है जिसके कारण आयात कम होता है और सोने की मांग में भी कमी आती है। ऐसा केवल भारत में ही देखा जाता है क्योंकि वैश्विक सोने के बाज़ार घरेलू मुद्राओं से प्रभावित नहीं होते।
 
7. पोर्टफोलियो डायवर्सिफिकेशन
पारम्परिक ऐसेट्स के साथ जुड़े जोखिमों और तनाव को देखते हुए सोने में निवेश को बेहतर माना जाता है। यह भी देखा गया है कि आमतौर पर सोने का किसी दूसरे पारम्परिक ऐसेट्स का साथ कोई रिश्ता नहीं है। कोई खास ऐसेट बाज़ार के दबाव में हो तो भी सोने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिए सोने में निवेश करने के निर्णय पर दूसरे ऐसेट्स के अस्थिर या स्थिर होने का प्रभाव पड़ सकता है।

भारत में सोने को लेकर प्यार पीढ़ियों से चला आ रहा है, दूरदृष्टि से देखें तो यह पसंद सही लगती है। अर्थशास्त्री क्लाउड बी एर्ब (नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च) और कैंपबेल हार्वे (फुक्वा स्कूल ऑफ बिजनेस, ड्यूक यूनिवर्सिटी ) ने हज़ारों वर्ष पहले के सोने के मूल्य की तुलना आज के सोने के मूल्यों से की और उन्होंने पता लगाया कि सोने ने इस लंबे समय में भी आमतौर से अपने मूल्य को बनाए रखा है।
 
दूसरे शब्दों में कहें तो सोने की क्रय शक्ति में समय के साथ कोई बदलाव नहीं हुआ है चाहे वह भारत में आज के सोने की कीमत हो या हज़ारों वर्ष पहले के सोने की। इतना ही नहीं, दूसरे ऐसेट्स के विपरीत सोना दुर्लभ है-  धरती के भीतर इसकी आपूर्ति सीमित है। और यह कभी नष्ट नहीं होता!

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