स्वास्थ्य बीमा खरीदते वक्त आपने इन 6 बातों को किया अनदेखा

अपने स्वास्थ्य संबंधी इतिहास को छुपाने से लेकर पॉलिसी की शर्तों को न पढ़ना, ये ऐसी आम 6 गलतियां हैं, जिनसे स्वास्थ्य बीमा खरीदते वक्त बचना चाहिए।

6 Things You Didn't Check Before Buying Health Insurance

परिवार के किसी सदस्य को गंभीर बीमारी होने से पूरे घर का बजट बिगड़ सकता है। फिर भी अधिकांश लोग स्वास्थ्य बीमा खरीदने को जरूरत के बजाय टैक्स बचाने का जरिया ही मानते हैं। भारत में हर 5 में से 1 व्यक्ति के पास भी स्वास्थ्य बीमा नहीं है। अगर आपके पास स्वास्थ्य बीमा नहीं है, तो देर न करें। सही स्वास्थ्य बीमा प्लान के चुनाव करते वक्त इन 6 गलतियों से बचें:

1. देरी से बीमा लेना – युवा होना स्वास्थ्य बीमा न लेने का बहाना नहीं है, क्योंकि किसी भी उम्र में आपको बीमारी जकड़ सकती है। जल्दी बीमा लेने के अपने फायदे हैं। आपको मौजूदा बीमारियां होने की संभावना कम होती है, जिससे आपको कम प्रीमियम पड़ता है और नो-क्लेम बोनस भी जमा होता है। ज्यादा देरी करने से आपको स्वास्थ्य बीमा नहीं मिलने का जोखिम होता है या फिर मौजूदा बीमारियों के लिए 4 साल तक वेटिंग पीरियड होता है, जिस दौरान आपको इन बीमारियों के लिए कवर नहीं मिलता है।
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2. नियोक्ता पर स्वास्थ्य बीमा के लिए निर्भर होना – नियोक्ता की ओर से मुहैया कराया गया कवर होना अच्छी बात है, लेकिन ये अपर्याप्त हो सकता है या आपकी जरूरत के मुताबिक नहीं हो सकता है। साथ ही, नौकरी बदलने के बीच के वक्त में आपके पास कोई स्वास्थ्य बीमा कवर नहीं होता है। इसलिए, जरूरी है कि आप निजी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी लें, इसके लिए फैमिली फ्लोटर पॉलिसी अच्छा विकल्प है क्योंकि इसमें एक ही प्लान के तहत परिवार के सभी सदस्यों को कवर मिलता है। टिप: क्लेम के वक्त नियोक्ता की पॉलिसी का इस्तेमाल करें ताकि आपकी निजी पॉलिसी पर नो-क्लेम बोनस जमा होता रहे।
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3. कम प्रीमियम के आधार पर पॉलिसी का चुनाव – कम प्रीमियम वाली स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में कई तरह की सुविधाएं शामिल नहीं भी हो सकती हैं, जिससे आपको पॉलिसी का पर्याप्त फायदा नहीं मिलता।
जब भी आप पॉलिसी खरीदें तब ध्यान रखें कि पॉलिसी में आपके परिवार के सदस्यों को जो बीमारियां हैं या बीमारियों का इतिहास है उनका कवर मिले।

इसके लिए आपको स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी के साथ क्रिटिकल इलनेस राइडर या फिर अलग से क्रिटिकल इलनेस प्लान लेना पड़ सकता है। घातक बीमारी या अवस्था की स्थिति में ये आपके अस्पताल के अलावा खर्चों को कवर करेगा, जो आमतौर पर सामान्य स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में कवर नहीं होते हैं।

4. शर्तों और बारीकियों को नहीं पढ़ना – जरूरी है कि आप पॉलिसी की बारीकियों को सावधानी पूर्वक पढ़ें, ताकि बाद में आपको निराशा न हो। ये देखें कि कौन सा आपके नजदीक का अस्पताल आपकी बीमा कंपनी के कैशलेस सूची में शामिल है। बीमा कंपनियां अस्पताल के कमरे का खर्च या किराए की सीमा सम अश्योर्ड के 1 फीसदी तक सीमित कर सकती हैं। अगर आपका सम अश्योर्ड 2 लाख रुपये है तो बीमा कंपनी रोजाना दो हजार रुपये तक ही अस्तपताल के कमरे का खर्च मंजूर करेगी। बाकी आपको अपनी जेब से भरना होगा। इसलिए, बीमा कंपनी के साथ इलाज के खर्च को साझा करने वाली को-पेमेंट जैसी शर्तों को ध्यान से देखें।

5. पॉलिसी की समीक्षा न करना – कम से कम हर पांच साल में अपनी पॉलिसी के कवर की समीक्षा करें और इसकी तुलना इलाज के मौजूदा खर्च से करें। अगर जरूरत हो तो अतिरिक्त कवर लें। अगर रिन्यूअल के वक्त प्रीमियम बढ़े या अतिरिक्त शर्तें जोड़ी जाएं तो बीमा कंपनी से इसकी सफाई मांगे। बाजार में आने वाली नए बीमा उत्पादों के बारे में जानकारी लेते रहें। उदाहरण के तौर पर टॉप-अप कवर नए किस्म का बीमा उत्पाद है। अगर आपको लगता है कि आपकी पॉलिसी में बहुत सारी पाबंदियां हैं तो पॉलिसी की विशेषताओं और लागत को देखकर बीमा कंपनी बदलें।
 

थोड़ी सी जांच-परख करने से स्वास्थ्य बीमा कवर आपको बड़ी मुश्किल से बचा सकता है। बस आप स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी का चुनाव सावधानी से करें।

 

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