हमें महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की आवश्यकता क्यों है?

जानिए कि तनाव से मुकाबला करने में महिलाएं किस तरह पुरुषों से अलग हैं और यह किस तरह उनके मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य को प्रभावित करता है।

हमें महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की आवश्यकता क्यों है?
  • एक बड़े शहर में पैदा हुई और पली-बढ़ी एक शिक्षित और स्मार्ट महिला ने असफल रिश्ते के कारण आत्महत्या कर ली (दुनिया की 60% आत्महत्याएं एशिया में होती हैं)।
  • एक छोटे और दूरदराज के गांव में, एक लड़की को इसलिए तिरस्‍कृत किया जाता है और परिवार से अलग एक छोटी सी गंदी झोपड़ी में रखा है, क्योंकि उसका मासिक धर्म जारी है। (भारत में हर साल सर्वाइकल कैंसर के चलते मौत के लगभग 60,000 मामले सामने आते हैं, जिनमें से दो-तिहाई मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता न रखने के कारण होते हैं)।
  • देश में कहीं न कहीं अनचाहे गर्भ को गिराने की कोशिश करते हुए एक किशोर लड़की की मृत्यु हो जाती है।( प्रतिवर्ष करीब 68,000 महिलाओं की मौत असुरक्षित गर्भपात से होती हैं, जिसके चलते यह मातृ मृत्यु दर के प्रमुख कारणों में से एक है।)
  • एक मां अपनी नवजात लड़की को मारती है और फिर खुद को मार देती है। (महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के अनुसार, भारत में हर दिन 2000 लड़कियों को मार दिया जाता है)

हमें व्यावहारिक रूप से हर दिन ऐसी घटनाओं के बारे में पता चलता है। इस तरह की खबरें किसी विशेष क्षेत्र या राज्य की नहीं हैं; ये घटनाएं उन स्‍थानों में भी सामने आ सकती हैं जो भौगोलिक रूप से एक दूसरे से दूर हैं, लेकिन फिर भी इनमें आपसी संबंध होता है। इन जगहों पर शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की समस्याओं से पीड़ित महिलाओं की मौतों के मामले एक जैसे हैं, जो अपने प्रियजनों तक पहुंच नहीं पाईं या पहुंच नहीं सकीं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, मानसिक बीमारी से पीड़ित और चिंता एवं अवसाद के लक्षण प्रदर्शित करने वाली महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में बहुत अधिक है। इसके पीछे कारण यह है कि आमतौर पर पुरुष अपने तनाव को बाहर निकाल देते हैं, वहीं दुर्भाग्यवश, महिलाएं किसी से बात नहीं करती हैं और समस्याओं के लिए खुद को दोषी मानती हैं, और बेकार एवं अवांछित महसूस करती हैं। 

इन सभी समस्याओं के बावजूद, इन तकलीफों से पीड़ित महिलाओं को लाभ पहुंचाने के लिए भारत के पास कोई स्पष्ट स्वास्थ्य नीति नहीं है। कई मामलों में, बलात्कार पीड़ितों को उनके परिवारों द्वारा त्‍याग दिया जाता है। एचआईवी और अन्य बीमारियों के संपर्क में आने के बाद इन महिलाओं का पुनर्वास बहुत मुश्किल हो जाता है। 

भारतीय संसद ने मैंटल हैल्‍थ केयर एक्‍ट, 2017 को पारित किया है, जिसमें कुछ प्रमुख क्रांतिकारी बदलाव किए गए हैं, जैसे कि भेदभाव-मुक्त स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच बढ़ाना और आत्महत्या को अपराध के दायरे से बाहर करना। महिलाओं के संरक्षण के लिए इन कानूनों को ठीक तरह से लागू किया भी जा रहा है या नहीं, दुर्भाग्य से इस बात की निगरानी के लिए कोई उचित एजेंसी या महिला निकाय नहीं है।

महिलाएं क्‍यों अधिक परेशानी झेलती हैं?

महिलाएं अधिक परेशान इसलिए नहीं होती कि वे पुरुषों के मुकाबले कमजोर हैं, बल्कि इसलिए होती हैं क्‍योंकि वे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से पुरुषों से भिन्‍न हैं। महिलाओं का दिमाग पुरुषों के मुकाबले अलग तरीके से काम करता है। जिस तरह से महिलाएं सोचती हैं, स्थितियों पर प्रतिक्रिया करती हैं, संवाद करती हैं, खुद को व्यक्त करती हैं, और रिश्ते निभाती हैं, वह पुरुषों से बिल्‍कुल अलग है और यह बात दुनिया भर में एक जैसी है।

भारत में, दुर्भाग्यवश, एक महिला की सोच को उसके जीवन में न केवल पुरुषों द्वारा बल्कि अन्य महिलाओं सहित पूरे समाज के द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

महिलाएं आज न केवल अपने घर की देखभाल कर रही हैं, बल्कि बाहर के काम भी देख रही हैं। ऐसी परिस्थिति में, जब घर पर या फिर कार्यस्‍थल पर उन पर काम का बोझ पड़ता है तो वे परेशान हो जाती हैं। 

सबसे आम कारण जो एक महिला को अवसाद के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं:

• मासिक धर्म, गर्भावस्था या प्रसव के कारण हार्मोनल परिवर्तन

कई महिलाएं मासिक धर्म के दौरान हार्मोनल परिवर्तन से प्रभावित होती हैं। इसकी वजह से उनकी मनोदशा और व्यवहार में बदलाव आते हैं और यह विशेष रूप से तब और मुश्किल हो जाता है जब वे बिना किसी भावनात्मक सहारे के परिवार से अलग होती हैं। गर्भावस्था और प्रसव के दौरान हार्मोनल परिवर्तन भी होते हैं।

हर 7 में से लगभग 1 महिला प्रसव के बाद अवसाद से पीडि़त होती है; ज्यादातर मामलों में वित्तीय समस्याओं के चलते या फिर बेटे के बजाय बेटी का जन्म प्रमुख कारण होता है। मेनोपॉज भी अवसाद का एक कारण हो सकता है।

  • जीवनसाथी के साथ दुर्व्‍यवहार भरा संबंध

भारत में महिलाएं आमतौर पर अपने जीवनसाथी के अत्‍याचार खिलाफ आवाज़ नहीं उठाती हैं। उन्‍हें अक्‍सर इस बात का डर सताता है कि ‘समाज क्‍या कहेगा’। वे अपने परिवार से सच्‍चाई छिपाती हैं क्‍योंकि वे उनकी जिंदगी अस्‍त-व्‍यस्‍त नहीं करना चाहतीं। यह उन्हें उस भावनात्मक सहयोग से वंचित करता है, जिसकी वे हकदार हैं। 

  • शारीरिक परेशानी के चलते तनाव 

अधिक वजन के चलते शरीर को लेकर शर्म भी कई बार महिलाओं में चिंता का कारण बनता है। वे नकारात्मक टिप्पणियों से बहुत जल्‍द परेशान हो सकती हैं।

  • कार्यालय का खराब वातावरण 

एक समान नौकरी और कार्यभार के लिए आम तौर पर महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कम वेतन मिलता है। अपनी नौकरी खोने के डर से अक्‍सर वे चुपचाप यौन शोषण सहती हैं।

  • आत्मसम्मान में कमी और परिवार का समर्थन नहीं मिलना 

यह समस्या विशेष रूप से भारत में अधिक इसलिए है क्योंकि महिलाओं को जन्म से ही सहनशील होना सिखाया जाता है। उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि दुख ही उनके भाग्य में है। सहारे की कमी के चलते उनके आत्मसम्मान में कमी आती है, जिससे अवसाद हो सकता है।

  • यौन हिंसा का शिकार होना

महिलाओं के खिलाफ हिंसा की दर लगभग 16% से 50% के बीच होने का अनुमान है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 5 में से 1 महिला बलात्कार या छेड़छाड़ का शिकार होती है। सबसे बुरी बात यह है कि अपराध का कारण बनने के लिए पीड़ितों को ही अक्सर दोषी महसूस कराया जाता है।

अवसाद के संकेत और लक्षण 

सबसे आम संकेत जिनसे इसका पता चल कर सकता है:

  • चिंता और घबराहट के दौरे 
  • चिड़चिड़ापन और गुस्‍सा
  • अत्‍यधिक रोना और बहुत तेजी से मिजाज़ बदलना 
  • भूख की समस्‍या (या तो बहुत कम या बहुत ज्‍यादा खाना)
  • परिवार और दोस्‍तों से बचना 
  • नींद न आना (अनिद्रा) या बहुत अधिक नींद आना
  • थकान या ऊर्जा की कमी 
  • पहले जिसमें मजा आता था अब उन कामों में कोई दिलचस्‍पी न होना 
  • फालतू होने, शर्म और अपराध की भावना 
  • बार-बार आत्‍महत्‍या का ख्‍याल आना

क्या स्थिति को सुधारा जा सकता है?

जी हां, कोई भी इस स्थिति को बदल सकता है। महिलाओं के साथ हमेशा उनके नज़दीकी लोगों (और अक्‍सर अजनबियों) द्वारा दुर्व्‍यवहार किया जाता है, फिर भी वे इस प्रताड़ना से अनिभिज्ञ होती हैं। महिलाओं को अपनी सोच को लेकर खुद पर ठप्‍पा लगने के डर से बाहर निकलना होगा। समस्‍या को पहचानने और उसे स्‍वीकार करने से इसका हल निकल सकता है। 

अगर समय पर पेशेवर मदद नहीं ली जाए तो पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर(पीटीएसडी) सेहत को खराब कर सकता है। इसलिए अपने आप को शिक्षित करें, अपने दिमाग पर ध्यान दें, और अपने अधिकारों के बारे में जागरूक रहें। खुद को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाएं; यह शोषण का मुकाबला करने की आपकी क्षमता को बढ़ाएगा। एक ऐसा सपोर्ट सिस्‍टम करें जो आपकी जरूरत की घड़ी में हमेशा आपके साथ खड़ा हो। 

मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लाने और भारतीय महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने के लिए देश सामाजिक, आर्थिक और कानूनी स्तर पर अपना काम कर रहा है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। आपका प्रियजन जो अवसाद से पीड़ित है, वह शायह महसूस नहीं कर सकता है या स्वीकार नहीं करता है कि उन्हें कोई समस्या है। यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप सावधान रहें और उनके लिए समय पर पेशेवर मदद लें।

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