एनएफओ की आधारभूत बातों की अच्छी समझ रखना

एनएफओ निवेशकों के लिए एक सुरक्षित निवेश हो सकता है। कारण जानने के लिए पढ़ें।

एनएफओ की आधारभूत बातों की अच्छी समझ रखना

न्यू फंड ऑफरिंग (एनएफओ) एक ऐसा निवेश अवसर है जो पब्लिक को मौजूदा उच्च परफॉर्मिंग म्युचुअल फंड्स की यूनिट प्रदान करता है। इसे असेट मैनेजमेंट कंपनियों द्वारा लॉंच किया जाता है, जिससे असेट अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) में वृद्धि होती है। निश्चित-आय वाले निवेशक एनएफओ को पसंद करते हैं क्योंकि ये एकसमान आय प्रदान करते हैं, मासिक या त्रैमासिक।

एनएफओ का क्या उद्देश्य है?

फंड मैनेजर निवेश का यह अवसर तैयार करते हैं ताकि फंड्स के अतिरिक्त स्रोत को बढ़ाने में मदद मिल सके और सभी स्टेकहोल्डरों के लिए फंड बास्केट को अनुकूल बनाया जा सके। वे इन फंड्स को मुख्य रूप से सिक्योरिटी (प्रतिभूति) खरीदने में करते हैं जैसे इक्विटी शेयर्स, सरकारी बॉन्ड इत्यादि। ओपन-एंडेड फंड्स और क्लोज्ड-एंडेड फंड्स जैसी रणनीतियों के जरिए वे निवेशकों को रिटर्न प्रदान करते हैं।

एनएफओ के विभिन्न प्रकार कौन-कौन से हैं?

  • क्लोज्ड-एंडेड फंड्स: इन्हें एनएफओ के लॉन्च के दौरान खरीदा जाना चाहिए और 3-4 वर्षों की लॉक-इन अवधि होती है। सिक्योर पुट विकल्प इन फंड्स के नकारात्मक पहलु को स्थिर करता है। सैद्धांतिक रूप से, इन फंड्स का ट्रेड स्टॉक मार्केट में किया जाता है, लेकिन वास्तव में उनकी लिक्विडिटी कम होती है।
  • ओपन-एंडेड फंड्स: इन्हें मुक्त रूप से स्टॉक मार्केट में खरीदा और बेचा जाता है और समय या कीमत के अर्थ में कोई प्रतिबंध नहीं होता। इन्हें एनएवी (नेट असेट वैल्यू) पर खरीदा और बेचा जाता है।

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एनएफओ में निवेश करने के कौन-कौन से फायदे हैं?

  • नई रणनीतियां: क्लोज्ड-एंडेड फंड्स (एनएफओ) में निवेश के नए आइडियाज होते हैं, जिन्हें अभी तक मार्केट में पेश नहीं किया गया है। इसके निवेश संभावना का मूल्यांकन करने के लिए व्यक्ति को फंड के थीम को अवश्य पढ़ना चाहिए। यदि रणनीति नई है, तो यह एक सफल निवेश हो सकता है, लेकिन एक आइडिया जो मार्केट में मौजूद है और कुछ नए रूप में प्रस्तुत किया जाता है, हो सकता है कि वही बैंडविड्थ प्रदान न करे। ऐसी स्थिति में स्टॉक्स में निवेश करना बेहतर होता है।
  • लोचशीलता: चूंकि लॉक-इन अवधि एनएफओ में निर्धारित रहता है, यह खरीदार और फंड मैनेजर दोनों को निवेश लोचशीलता प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में, यदि निवेश समय परिवर्तनशील है और मार्केट अपने चरम पर है, तो फंड मैनेजर कुछ फंड को होल्ड करके इसे निवेशक के लिए बाद में निवेश कर सकता है। इससे फंड मैनेजर को अच्छ परफॉर्म करने में मदद मिलती है।
  • कोई बड़े नगद का आउटफ्लो नहीं: लॉक-इन अवधि के कारण एनएफओ नगद के बड़े आउटफ्लो से मुक्त होते हैं। परिणामस्वरूप, फंड मैनेजर स्टॉक्स में निवेशों के चयन पर ध्यान दे सकता है और उसी समय दूसरे स्टॉक्स में निवेशों की निगरानी कर सकता है। इससे क्लोज्ड-एंडेड फंड्स के लिए जरूरी सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • लॉक-इन सहारा: इससे एनएफओ के लिए जरूरी सहारा प्राप्त होता है। बुरे निवेशों से बचा जाता है क्योंकि फंड्स आउटफ्लो 3-4 वर्षों तक नियंत्रित रहता है। यह निवेशक को इक्विटी शेयर मार्केट के हलचलों और उन्माद से बचाता है।

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एनएफओ में निवेश करने से पहले व्यक्ति को क्या ध्यान में रखना चाहिए?

एनएफओ मुख्य रूप से स्थायी आय समूहों को आकर्षित करता है, खासकर उनके करियर के बाद के समय में जो लगातार आमदनी पाना चाहते हैं। यहां आमदनी 3-4% प्रतिशत है, जहां निवेश का नुकसान पुट विकल्प द्वारा सुरक्षित होता है।

  • शोध: म्युचुअल फंड का अच्छी तरह से शोध किया जाना चाहिए। परफॉर्मिंग म्युचुअल फंड द्वारा जारी एनएफओ से आमतौर पर अच्छे परफॉर्मेंस की अपेक्षा की जाती है। फंड हाउस को बेहतर रिटर्न बनाने के लिए पिछले 5-10 वर्षों का अच्छा परफॉर्मेंस दिखाना होता है।
  • ऑब्जेक्टिव्स का स्पष्टीकरण: एनएफओ के ऑब्जेक्टिव्स को अच्छी तरह से पढ़ना जरूरी है। एनएफओ निवेशक को यह समझना जरूरी होता है कि उसके निवेश का क्या उपयोग हो रहा है। यदि निवेशक को यह स्पष्ट नहीं है, तो इसका अर्थ है कि निवेश प्रक्रिया में कोई त्रुटि है। एनएफओ की व्यवहार्यता की माप करने के लिए यह स्टेप जरूरी है।
  • थीम एनालिसिस: इसके बाद एनएफओ की थीम का पता लगाना जरूरी है। यदि थीम यूनिक है और किसी मौजूदा फंड का कॉपीकैट नहीं है, तो संभव है कि आप सही एनएफओ में निवेश कर रहे हैं।
  • एनएफओ रिटर्न्स: यदि फंड का परिचालन कुछ वर्षों से हो रहा है तो पिछए रिटर्न्स का सत्यापन जरूरी है। यदि फंड में धनराशि पहले से निवेशित है तो रिटर्न्स की निगरानी के लिए पहले 2-3 वर्षों तक त्रैमासिक विश्लेषण किया जा सकता है। साथ-साथ, समकक्ष फंडों और इंडेक्स के प्रति रुझानों की जांच की जानी चाहिए, ताकि परफॉर्मेंस की जांच हो सके और अपेक्षित रिटर्न निकाला जा सके।
  • क्लोज्ड-एंडेड जोखिम: एनएफओ जोखिम भरे हो सकते हैं क्योंकि हो सकता है कि नए आइडिया सफल हो या न हों। इसके अलावा, निवेशक को यह नहीं पता चलता कि फंड मैनेजर फंड का किस प्रकार उपयोग करेगा। फंड मैनेजर के परफॉर्मेंस की जांच की जानी चाहिए, लेकिन इसके बावजूद यह जान पाना कठिन होता है कि कोई बिल्कुल नया फंड मार्केट में कैसा परफॉर्म करेगा।
  • निवेश में लागत की जांच करना: इस बात की जांच करना महत्वपूर्ण होता है कि लागत अनुपात (कॉस्ट रेश्यो) एसईबीआई (सेबी) द्वारा आज्ञापित रूप में है या इससे कम है। फंड हाउस द्वारा लिए जाने वाले वार्षिक शुल्क के साथ-साथ अवधि से पहले प्लान को बनाए रखने के शुल्क को खंडित किया जाना चाहिए। इस खर्चों को प्रस्तावित आय से घटाया जाना चाहिए।
  • सब्सक्रिप्शन शुल्क: निवेश के निर्णय के मूल्यांकन के लिए यह दूसरा मानदंड है। यदि सब्सक्रिप्शन उपलब्द फंड से अधिक है, तो निवेश का दुबारा मूल्यांकन करने की जरूरत है। अपने पैसे को किसी मौजूदा उच्च परफॉर्मिंग फंड में सिस्टमेटिक इंवेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के जरिए निवेश करना अच्छा हो सकता है।
  • निवेश की अवधि: एनएफओ की लॉक-इन अवधि 3-5 वर्ष की होती है। इसलिए, इस बात की सलाह दी जाती है कि अच्छी तरह से सोच-समझकर अपना निर्णय लें क्योंकि समय से पहले छोड़ने पर उच्च शुल्क किया जा सकता है। लंबे समय तक निवेशित रहने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है।

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अंतिम शब्द

अपने संपूर्ण उपलब्ध फंड को एनएफओ में निवेश करने की सलाह नहीं दी जाती है; आपको इसे विभिन्न निवेश विकल्पों में बांटना चाहिए। किसी एनएफओ में निवेश करने का निर्णय म्युचुअल फंड, फंड मैनेजर, और फंड के ऑब्जेक्टिव में शामिल जोखिमों का अच्छी तरह से अध्ययन करने के बाद लिया जाना चाहिए। यदि आप शोध करना नहीं चाहते या करने में सक्षम नहीं हैं, तो ऑवर की अवधि समाप्त होने ले बाद, नेट असेट वैल्यू (एनएवी) पर खरीदना अच्छा होगा।




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