दीर्घ-कालिक बॉन्ड यील्ड और आपकी इक्विटी और डेट निवेशों पर इसका प्रभाव

बॉन्ड यील्ड की एक स्पाइक स्टॉक ऐक्सचेंज को हिला सकता है। जानें कि निवेशकों को इसके बारे में क्यों और क्या जानना चाहिए।

दीर्घ-कालिक बॉन्ड यील्ड और आपकी इक्विटी और डेट निवेशों पर इसका प्रभाव

यदि हम पिछले दो वर्षों के इंडिया 10-ईयर बॉन्ड यील्ड को देखें, तो यह अप्रैल 2019 में 7.5% के करीब रहा, और इन 24 महीनों में 21 महीने 7% के नीचे बना रहा। हालांकि, चूंकि यह पिछले वर्ष अक्टूबर में घटकर 5.8% हो गया, फिर भी इसने सुधार के लक्षण दिखाए। प्रभावशाली यूएस बॉन्ड यील्ड में भी पिछले वर्ष की दूसरी छमाही से वृद्धि हुई है। यह इतना प्रभावशाली है कि यह आपके डेट और इक्विटी निवेशों को भी प्रभावित कर सकता है।

बॉन्ड यील्ड्स को समझना

गवर्नमेंट बॉन्ड्स डेट प्रतिभूतियां होती हैं जिन्हें सरकारी खर्चों को पूरा करने के लिए सरकार द्वारा जारी किया जाता है। इन्हें यूएस में ट्रेजरीज, भारत में जी-सेक्स और यूके में गिल्ट्स कहा जाता है। सरकारी बॉन्ड्स को एक निर्धारित कीमत पर जारी किया जाता है जिसे समय समाप्ति पर वापस कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि इंडिया 10-ईयर्स बॉन्ड की कीमत 100 रुपए हैं, तो आपको दसवें साल में 100 रुपए मिलेंगे। इसके अलावा, हरेक साल आपको बॉन्ड यील्ड मिलेगा जो मार्च 2021 में लगभग 6.1% रहा। 

वार्षिक लाभ में वृद्धि होने पर, अधिक से अधिक लोग इन सरकारी बॉन्ड्स में निवेश करने के इच्छुक होते हैं। हालांकि, जितने अधिक निवेशक बॉन्ड्स की ओर अपना रुख करते हैं, बॉन्ड्स की मांग उतनी ही बढ़ जाती है और इसकी कीमत में इजाफा होता है। ऊपर के उदाहरण में, यदि बढ़ती मांग के कारण बॉन्ड की कीमत बढ़कर 102 रुपया हो जाता है, तो इसपर होने वाला शुद्ध लाभ घट जाएगा क्योंकि लाभ 6.1% पर तय है। 

हालांकि, यदि निवेशकों को बॉन्ड्स का कोई लाभकारी विकल्प मिल जाता है, तो वे बॉन्ड्स नहीं लेंगे जिससे उनकी कीमत में गिरावट आ जाएगी। इससे शुद्ध लाभ में वृद्धि होती है। हाल के समय में, कोविड-19 वैक्सिन के आने और सरकारी प्रोत्साहन पैकेज के कारण अर्थव्यवस्था में दुबारा उछाल से सरकारी बॉन्ड्स की मांग कम हो गई। इससे सरकारी बॉन्ड यील्ड में एक बढ़ोतरी भी हुई।

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यूएस बॉन्ड यील्ड्स का महत्व

दुनिया भर के निवेशकों में यूएस बॉन्ड्स एक लोकप्रिय विकल्प हैं। इसलिए, इसके लाभ में होने वाले परिवर्तनों का प्रभाव दुनिया भर में देखने को मिलता है। यह निवेशकों में सबसे सुरक्षित निवेश कहा जाता है, और यदि इसका लाभ बढ़ता है, तो दुनिया भर के निवेशक अपने मौजूदा निवेश से धन निकालते हैं और यूएस बॉन्ड्स खरीदते हैं। भारत में, निवेशों में कमी देखी जाएगी ज्यों-ज्यों निकासी में वृद्धि होगी। 

इंडियन जी-सेक्स यूएस बॉन्ड यील्ड्स में होने वाली वृद्धि पर प्रतिक्रिया देता है, घरेलू बॉन्ड्स की मांग भी बढ़ जाती है। दूसरी तरह से, जैसा कि हम देखते हैं यह निजी निवेशों को प्रभावित करता है। 

इक्विटी मार्केट्स पर प्रभाव

बॉन्ड यील्ड्स निवेशकों के अपने इक्विटी जोखिम और रिटर्न दर का मूल्यांकन करने में एक महत्वपूर्ण बंचेमार्क हैं। हाइ बॉन्ड यील्ड इक्विटी मार्केट के लिए बुरा है क्योंकि कोई निवेशक बॉन्ड्स के जरिए कम जोखिम के साथ अधिक अर्जित करना चाहता है। कुछ बॉन्ड यील्ड-संबंधित कारकों की सूची नीचे दी गई है जो इक्विटी मार्केट पर इसके प्रभाव का निर्धारण करते हैं।

  • रिस्क प्रीमियम: इस वक्त लगभग 6% पर सरकारी यील्ड्स के साथ, आइए हम मान लें कि इक्विटी रिस्क प्रीमियम 4% है। साथ मिलकर यह 10% हो जाता है, जो इक्विटी निवेश की अवसर लागत होती है। निवेशक यह दावा करेगा कि इसमें शामिल रिस्क प्रीमियम के कारण 10% से कम के इक्विटी निवेश में कोई दम नहीं है। निवेशक प्राय: इक्विटी रिस्क प्रीमियम का उपयोग इक्विटीज में निवेश करते समय एक निर्णयकारी कारक के रूप में करते हैं।
  • अर्निंग यील्ड तुलना: स्टॉक का अर्निंग्स यील्ड या इसकी अर्निंग प्रति शेयर (ईपीएस) की तुलना बॉन्ड बनाम इक्विटी निवेश निर्णय में बॉन्ड यील्ड के साथ की जाती है। भारत में विदेशी निवेशक यील्ड के बढ़ने पर इक्विटी मार्केट से निकल जाते हैं, इसलिए इस आउटफ्लो की भी बॉन्ड यील्ड स्पाइक्स के दौरान निगरानी की जाती है। लेकिन निवेशक भी स्टॉक के पी/ई रेश्यो को देखते हैं। इसलिए, एक हाइ बॉन्ड यील्ड सिनैरियो में, निवेशक तब भी स्टॉक्स में निवेश करना चाह सकते हैं यदि उसका पी/ई रेश्यो कम होता है। उनका निर्णय वैसा ही होगा जैसा कि नुकसान में चलने वाली कंपनी की स्थिति में होता है जो स्टॉक प्राइसेज में एक टर्नअराउंड की अपेक्षा होती है।
  • पूंजी लागत: बढ़ा हुआ बॉन्ड यील्ड कंपनियों के लिए पूंजी लागत को बढ़ाता है। इससे उसका फ्यूचर कैश फ्लो प्रभावित होता है, जो फ्यूचर स्टॉक वैल्युएशन को कम करता है। हालांकि, शीर्ष बैंक द्वारा की जाने वाली ब्याज दर कटौती से पूंजी लागत घट जाती है और स्टॉक वैल्युएशन बहाल हो जाता है।

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डेट मार्केट्स पर प्रभाव

हाल के वर्षों में, इंडियन डेट की मांग की मांग बढ़ी है क्योंकि बॉन्ड यील्ड में इजाफा हुआ है। बॉन्ड यील्ड में हालिया बढ़ोतरी के साथ, निवेशक (विदेशी निवेशकों सहित) इक्विटी निवेशों से बाहर निकल गए और भारी रूप से इंडियन डेट में निवेश किया। विदेशी निवेशक प्रतिस्पर्धी उत्पादों के रूप में भारतीय इक्विटीज और डेट्स की ओर रुख करते हैं और दोनों के बीच एक इंवर्स रिलेशनशिप का निर्माण करते हैं। 

ब्याज दरों में एक कमी से डेट निवेशों की मांग कम हो जाती है, क्योंकि रिटर्न कम होता है। यदि उस बिंदु पर बॉन्ड यील्ड अच्छा होता है, तो निवेशक बॉन्ड्स की ओर लपकते हैं, जिससे इसकी मांग बढ़ जाती है। इससे बॉन्ड की कीमत बढ़ जाती है और इसकी यील्ड घट जाती है। मांग और आपूर्ति के बीच का यह संघर्ष ऋण और बांड के बीच एक नए संतुलन की दिशा में काम करता है। 

साथ ही, सरकारी उधार लेने की लागत, अर्थात बॉन्ड यील्ड, अर्थव्यवस्था में डेट प्राइसिंग के लिए एक बेंचमार्क है। इसलिए बॉन्ड यील्ड में होने वाले बदलाव से लोन मार्केट प्रभावित होता है। 

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अंतिम शब्द

निवेशकों को कोई निवेश निर्णय लेते समय वैश्विक एवं घरेलू डेवलपमनेट पर नजर बनाए रखना होता है। ब्याज दरें और महंगाई बॉन्ड यील्ड्स को प्रभावित करती है, लेकिन वे ब्याज दर, सरकार की बॉरोइंग प्रोग्राम, वित्तीय घाटा, महंगाई और अर्थव्यवस्था की स्थिति, राष्ट्रीय रेटिंग, भौगोलिक कारक इत्यादि द्वारा प्रभावित होते हैं।

बाइडेन प्रशासन के अंतर्गत, यूएस बॉन्ड यील्ड में आगे बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, जिसका इक्विटीज और अन्य परिसंपत्ति वर्गों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। एक निवेशक के रूप में, आपको ऐसे विभिन्न कारकों को देखना होगा जो बॉन्ड की कीमत और यील्ड पर दबाव डालते हैं, और अपने निवेशों पर पड़ने वाले प्रभावों को निकट से देखना होगा। क्या आप अभी भीडेट फंड्स को लेकर उलझन में हैं? यहां छह सामान्य प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं

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