शेयर बाजार को प्रभावित करने वाले कारक: आरबीआई(RBI) की मौद्रिक नीति, केंद्रीय बजट, मुद्रास्फीति, सरकारी नीति | Factors that affect the Indian stock market

भारतीय शेयर बाजार को कई कारक प्रभावित करते हैं। अनुकूल कारकों के कारण शेयर की कीमत बढ़ती है और प्रतिकूल कारकों के कारण शेयर की कीमतें घटती हैं।

10 ऐसे कारक जो भारतीय शेयर बाजार को प्रभावित करते है

इससे पहले कि हम उन कारकों की बात करें जो भारतीय शेयर बाजार को प्रभावित करते हैं, आइए सरसरे तौर पर देखते हैं कि शेयर बाजार कैसे काम करते हैं। स्‍टॉक मार्केट, उन कंपनियों जो पैसा जुटाना चाहती हैं और ऐसे निवेशक के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं जो अपने पैसे पर रिटर्न कमाना चाहते हैं।

शेयर बाजार दो प्रकार के होते हैं:

  1. प्राइमरी मार्केट: जब कोई कंपनी पहली बार जनता से पैसा जुटाती है, तो वह एक इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के माध्यम से होता है।
  2. सेकेंडरी मार्केट: एक बार जब शेयर सूचीबद्ध जाता है, तो निवेशकों के बीच खरीद और बिक्री शेयर बाजार के माध्यम से होती है।

निवेशकों के लिए संसाधन

यदि आप एक नए निवेशक हैं, तो आपको खुद को शेयर की कीमतों को प्रभावित करने वाले कारकों से परिचित कराना चाहिए। आप इनसे जानकारी प्राप्त कर सकते हैं:

  • बिजनेस न्‍यूज़पेपर- द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, लाइवमिंट, आदि
  • बिजनेस मैगज़ीन्‍स- दलाल स्ट्रीट, कैपिटल मार्केट, बिजनेस इंडिया, आदि
  • बिजनेस न्यू चैनल- – CNBC TV 18, ET नाउ, जी बिजनेस आदि
  • व्यक्तिगत फाइनेंस वेबसाइट्स - टुमॉरोमेकर्स, मनीकंट्रोल, वैल्यू रिसर्च, आदि

अब जब आप जानते हैं कि शेयर बाजार से संबंधित खबरों से खुद को कैसे अपडेट रखें, तो आइए हम शेयर बाजारों को प्रभावित करने वाले कुछ कारकों पर चर्चा करते हैं। इनमें से कुछ हैं:

1. आरबीआई की मौद्रिक नीति और ब्याज दरें

आरबीआई ने मौद्रिक नीति बताते हुए ब्याज दरों पर अपने फैसले की घोषणा की। ब्याज दरों में कमी शेयर बाजार के लिए अच्छी बात है, लेकिन बढ़ोतरी अच्छी बात नहीं है। ब्याज दरें कम होने पर स्टॉक आमतौर पर ऊपर की ओर जाते हैं और ब्याज दरों में वृद्धि होने पर गिरते हैं। शेयर बाजार लिक्विडिटी पर प्रतिक्रिया करते हैं। यदि आरबीआई वित्तीय प्रणाली में लिक्विडिटी बढ़ाता है, तो बाजार सकारात्मक प्रतिक्रिया देता है। यदि आरबीआई लिक्विडिटी कम करता है, तो बाजार प्रतिकूल प्रतिक्रिया करता है।

2.केंद्रीय बजट
 केंद्रीय बजट का शेयर बाजारों पर बड़ा असर पड़ता है। बजट घोषणाओं के दौरान, निवेशक कुछ बातों पर ध्यान देते हैं जैसे कि क्या सरकार का राजकोषीय घाटा नियंत्रण में है, अगले वित्तीय वर्ष में वह कितना पैसा उधार लेंगे, आदि। निवेशक इस बात पर भी विचार करते हैं कि क्या किसी क्षेत्र को कोई प्रोत्साहन दिया गया है या क्या किसी भी क्षेत्र के लिए मौजूदा प्रोत्साहन वापस ले लिया गया है। यदि राजमार्गों, रेलवे, एयरपोर्ट, पॉवर, स्वास्थ्य सेवा आदि में नयी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को शुरू करने की योजना की घोषणा की जाती है, तो सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में लाभ मिलने की उम्मीद होती है।

3. मुद्रास्फीति

सरकार हर महीने महंगाई के आंकड़े जारी करती है। उच्च मुद्रास्फीति के कारण आरबीआई ब्याज दरों को बढ़ाता है, जो शेयर बाजारों के लिए अच्छा नहीं है। कम मुद्रास्फीति के कारण आरबीआई या तो ब्याज दरों में कटौती करता है या यथास्थिति बनाए रखता है, जो शेयर बाजारों के लिए अच्छा होता है।

4. कंपनियों के वित्‍तीय परिणाम

कंपनियों के वित्तीय परिणाम एक सबसे बड़ा कारक है जो व्यक्तिगत कंपनियों, क्षेत्रों और बाजार के शेयर की कीमतों को कुल मिलाकर प्रभावित करते हैं। अगर वित्तीय नतीजे उम्मीद से बेहतर रहे तो शेयर की कीमतों में तेजी आएगी। यदि वे अपेक्षा के अनुरूप नहीं हैं, या यदि कोई नकारात्मक प्रभाव (नेगेटिव सरप्राइज़) है, तो स्टॉक की कीमतें प्रतिकूल प्रतिक्रिया करती हैं।

5. सरकारी नीति

समय-समय पर सरकार कुछ क्षेत्रों के लिए नीतियों की घोषणा करती है जो उस क्षेत्र की सूचीबद्ध कंपनियों को लाभ पहुंचाती हैं। उदाहरण के लिए, किसी निर्यात योजना से उन कंपनियों को लाभ मिलता है जो वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात करती हैं। भारत में विनिर्माण बढ़ाने के लिए, सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई क्षेत्रों के लिए एक प्रोडक्‍टशन लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना की घोषणा की है। ऐसी नीतिगत घोषणाओं पर शेयर बाजार आमतौर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं।

6. FDI और FPI नीति के माध्यम से निवेश

कई कंपनियां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) या विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के माध्यम से विदेशी निवेशकों से धन जुटाना चाहती हैं। एफडीआई(FDI) या एफपीआई नीति(FPI) में कोई भी वृद्धि शेयर बाजारों के लिए सकारात्मक होती है।

7. विनिमय दर (एक्‍सचेंज रेट)

अमेरिकी डॉलर (USD) के मुकाबले भारतीय रुपये (INR) की विनिमय दर विदेशी निवेशकों के निवेश निर्णयों को प्रभावित करती है। रुपये में गिरावट विदेशी निवेशकों के रिटर्न को समाप्‍त कर देती है। अगर समय के साथ रुपये में लगातार गिरावट आती है और शेयर बाजार अच्छा रिटर्न देता है, तो विदेशी निवेशकों को इससे कोई परेशानी नहीं होगी। लेकिन अगर बहुत कम समय में रुपये में बहुत अधिक गिरावट आ जाती है, तो यह विदेशी निवेशकों को डरा सकता है, जिससे वे अपने भारतीय निवेश को बेच सकते हैं और भारतीय बाजारों से बाहर निकल सकते हैं, जिससे विनिमय दर और बढ़ जाती है।

8. राजनीतिक स्थिरता

शेयर बाजार स्पष्ट बहुमत वाली सरकार को पसंद करते हैं जो आर्थिक विकास के लिए साहसिक सुधार कर सकती है। ऐसे समय में शेयर बाजार अच्छा प्रदर्शन करते हैं। यदि केंद्र में गठबंधन सरकार है जो आसानी से निर्णय नहीं ले सकती है, तो इससे नीतियों की गतिहीनता कम होती है। ऐसी स्थितियों में विदेशी निवेशक और शेयर बाजार प्रतिकूल प्रतिक्रिया देते हैं।

9. प्राकृतिक आपदाएं और महामारी

शेयर बाजार प्राकृतिक आपदाओं जैसे बड़े भूकंप, सूनामी, बाढ़, सूखा आदि पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया करते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि हाल ही में शेयर बाजारों में सबसे बड़ी गिरावट आई थी जब कोविड-19 महामारी बिना किसी चेतावनी के आई थी।

10. कमोडिटी की कीमतें – इनपुट की लागत

भारत कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, तांबा, एल्युमीनियम आदि जैसी कई वस्तुओं का आयात करता है। इन वस्तुओं की कीमतों में किसी भी तेज वृद्धि से कंपनियों के लिए इनपुट लागत बढ़ जाती है। इससे उनका मार्जिन कम हो जाता है और उनकी लाभप्रदता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, जिससे उनके शेयर की कीमतों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि होती है, तो इससे मुद्रास्फीति बढ़ती है, जिसके परिणामस्वरूप आरबीआई ब्याज दरों में वृद्धि करता है। इसका भी शेयर बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अंतिम शब्‍द

हमने भारतीय शेयर बाजार को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों पर चर्चा की। इनके माध्यम से आगे बढ़ने के लिए, निवेशकों का इक्विटी, डेब्ट और सोने में उपयुक्त एसेट आवंटन करना चाहिए। आमतौर पर जब शेयर बाजार में गिरावट आती है तो सोना अच्छा प्रदर्शन करता है और डेब्ट निवेश पोर्टफोलियो को स्थिरता प्रदान करता है। एसेट का आवंटन आपको शेयर बाजारों की अनिश्चितता के दौर से गुजरने में मदद कर सकता है। इसके अलावा, इक्विटी के भीतर, आपको अपने निवेश को लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप शेयरों में विविधता प्रदान करनी चाहिए ताकि जोखिम कई के बीच फैल कर नियंत्रित हो जाए।

 

इससे पहले कि हम उन कारकों की बात करें जो भारतीय शेयर बाजार को प्रभावित करते हैं, आइए सरसरे तौर पर देखते हैं कि शेयर बाजार कैसे काम करते हैं। स्‍टॉक मार्केट, उन कंपनियों जो पैसा जुटाना चाहती हैं और ऐसे निवेशक के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं जो अपने पैसे पर रिटर्न कमाना चाहते हैं।

शेयर बाजार दो प्रकार के होते हैं:

  1. प्राइमरी मार्केट: जब कोई कंपनी पहली बार जनता से पैसा जुटाती है, तो वह एक इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के माध्यम से होता है।
  2. सेकेंडरी मार्केट: एक बार जब शेयर सूचीबद्ध जाता है, तो निवेशकों के बीच खरीद और बिक्री शेयर बाजार के माध्यम से होती है।

निवेशकों के लिए संसाधन

यदि आप एक नए निवेशक हैं, तो आपको खुद को शेयर की कीमतों को प्रभावित करने वाले कारकों से परिचित कराना चाहिए। आप इनसे जानकारी प्राप्त कर सकते हैं:

  • बिजनेस न्‍यूज़पेपर- द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, लाइवमिंट, आदि
  • बिजनेस मैगज़ीन्‍स- दलाल स्ट्रीट, कैपिटल मार्केट, बिजनेस इंडिया, आदि
  • बिजनेस न्यू चैनल- – CNBC TV 18, ET नाउ, जी बिजनेस आदि
  • व्यक्तिगत फाइनेंस वेबसाइट्स - टुमॉरोमेकर्स, मनीकंट्रोल, वैल्यू रिसर्च, आदि

अब जब आप जानते हैं कि शेयर बाजार से संबंधित खबरों से खुद को कैसे अपडेट रखें, तो आइए हम शेयर बाजारों को प्रभावित करने वाले कुछ कारकों पर चर्चा करते हैं। इनमें से कुछ हैं:

1. आरबीआई की मौद्रिक नीति और ब्याज दरें

आरबीआई ने मौद्रिक नीति बताते हुए ब्याज दरों पर अपने फैसले की घोषणा की। ब्याज दरों में कमी शेयर बाजार के लिए अच्छी बात है, लेकिन बढ़ोतरी अच्छी बात नहीं है। ब्याज दरें कम होने पर स्टॉक आमतौर पर ऊपर की ओर जाते हैं और ब्याज दरों में वृद्धि होने पर गिरते हैं। शेयर बाजार लिक्विडिटी पर प्रतिक्रिया करते हैं। यदि आरबीआई वित्तीय प्रणाली में लिक्विडिटी बढ़ाता है, तो बाजार सकारात्मक प्रतिक्रिया देता है। यदि आरबीआई लिक्विडिटी कम करता है, तो बाजार प्रतिकूल प्रतिक्रिया करता है।

2.केंद्रीय बजट
 केंद्रीय बजट का शेयर बाजारों पर बड़ा असर पड़ता है। बजट घोषणाओं के दौरान, निवेशक कुछ बातों पर ध्यान देते हैं जैसे कि क्या सरकार का राजकोषीय घाटा नियंत्रण में है, अगले वित्तीय वर्ष में वह कितना पैसा उधार लेंगे, आदि। निवेशक इस बात पर भी विचार करते हैं कि क्या किसी क्षेत्र को कोई प्रोत्साहन दिया गया है या क्या किसी भी क्षेत्र के लिए मौजूदा प्रोत्साहन वापस ले लिया गया है। यदि राजमार्गों, रेलवे, एयरपोर्ट, पॉवर, स्वास्थ्य सेवा आदि में नयी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को शुरू करने की योजना की घोषणा की जाती है, तो सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में लाभ मिलने की उम्मीद होती है।

3. मुद्रास्फीति

सरकार हर महीने महंगाई के आंकड़े जारी करती है। उच्च मुद्रास्फीति के कारण आरबीआई ब्याज दरों को बढ़ाता है, जो शेयर बाजारों के लिए अच्छा नहीं है। कम मुद्रास्फीति के कारण आरबीआई या तो ब्याज दरों में कटौती करता है या यथास्थिति बनाए रखता है, जो शेयर बाजारों के लिए अच्छा होता है।

4. कंपनियों के वित्‍तीय परिणाम

कंपनियों के वित्तीय परिणाम एक सबसे बड़ा कारक है जो व्यक्तिगत कंपनियों, क्षेत्रों और बाजार के शेयर की कीमतों को कुल मिलाकर प्रभावित करते हैं। अगर वित्तीय नतीजे उम्मीद से बेहतर रहे तो शेयर की कीमतों में तेजी आएगी। यदि वे अपेक्षा के अनुरूप नहीं हैं, या यदि कोई नकारात्मक प्रभाव (नेगेटिव सरप्राइज़) है, तो स्टॉक की कीमतें प्रतिकूल प्रतिक्रिया करती हैं।

5. सरकारी नीति

समय-समय पर सरकार कुछ क्षेत्रों के लिए नीतियों की घोषणा करती है जो उस क्षेत्र की सूचीबद्ध कंपनियों को लाभ पहुंचाती हैं। उदाहरण के लिए, किसी निर्यात योजना से उन कंपनियों को लाभ मिलता है जो वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात करती हैं। भारत में विनिर्माण बढ़ाने के लिए, सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई क्षेत्रों के लिए एक प्रोडक्‍टशन लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना की घोषणा की है। ऐसी नीतिगत घोषणाओं पर शेयर बाजार आमतौर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं।

6. FDI और FPI नीति के माध्यम से निवेश

कई कंपनियां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) या विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के माध्यम से विदेशी निवेशकों से धन जुटाना चाहती हैं। एफडीआई(FDI) या एफपीआई नीति(FPI) में कोई भी वृद्धि शेयर बाजारों के लिए सकारात्मक होती है।

7. विनिमय दर (एक्‍सचेंज रेट)

अमेरिकी डॉलर (USD) के मुकाबले भारतीय रुपये (INR) की विनिमय दर विदेशी निवेशकों के निवेश निर्णयों को प्रभावित करती है। रुपये में गिरावट विदेशी निवेशकों के रिटर्न को समाप्‍त कर देती है। अगर समय के साथ रुपये में लगातार गिरावट आती है और शेयर बाजार अच्छा रिटर्न देता है, तो विदेशी निवेशकों को इससे कोई परेशानी नहीं होगी। लेकिन अगर बहुत कम समय में रुपये में बहुत अधिक गिरावट आ जाती है, तो यह विदेशी निवेशकों को डरा सकता है, जिससे वे अपने भारतीय निवेश को बेच सकते हैं और भारतीय बाजारों से बाहर निकल सकते हैं, जिससे विनिमय दर और बढ़ जाती है।

8. राजनीतिक स्थिरता

शेयर बाजार स्पष्ट बहुमत वाली सरकार को पसंद करते हैं जो आर्थिक विकास के लिए साहसिक सुधार कर सकती है। ऐसे समय में शेयर बाजार अच्छा प्रदर्शन करते हैं। यदि केंद्र में गठबंधन सरकार है जो आसानी से निर्णय नहीं ले सकती है, तो इससे नीतियों की गतिहीनता कम होती है। ऐसी स्थितियों में विदेशी निवेशक और शेयर बाजार प्रतिकूल प्रतिक्रिया देते हैं।

9. प्राकृतिक आपदाएं और महामारी

शेयर बाजार प्राकृतिक आपदाओं जैसे बड़े भूकंप, सूनामी, बाढ़, सूखा आदि पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया करते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि हाल ही में शेयर बाजारों में सबसे बड़ी गिरावट आई थी जब कोविड-19 महामारी बिना किसी चेतावनी के आई थी।

10. कमोडिटी की कीमतें – इनपुट की लागत

भारत कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, तांबा, एल्युमीनियम आदि जैसी कई वस्तुओं का आयात करता है। इन वस्तुओं की कीमतों में किसी भी तेज वृद्धि से कंपनियों के लिए इनपुट लागत बढ़ जाती है। इससे उनका मार्जिन कम हो जाता है और उनकी लाभप्रदता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, जिससे उनके शेयर की कीमतों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि होती है, तो इससे मुद्रास्फीति बढ़ती है, जिसके परिणामस्वरूप आरबीआई ब्याज दरों में वृद्धि करता है। इसका भी शेयर बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अंतिम शब्‍द

हमने भारतीय शेयर बाजार को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों पर चर्चा की। इनके माध्यम से आगे बढ़ने के लिए, निवेशकों का इक्विटी, डेब्ट और सोने में उपयुक्त एसेट आवंटन करना चाहिए। आमतौर पर जब शेयर बाजार में गिरावट आती है तो सोना अच्छा प्रदर्शन करता है और डेब्ट निवेश पोर्टफोलियो को स्थिरता प्रदान करता है। एसेट का आवंटन आपको शेयर बाजारों की अनिश्चितता के दौर से गुजरने में मदद कर सकता है। इसके अलावा, इक्विटी के भीतर, आपको अपने निवेश को लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप शेयरों में विविधता प्रदान करनी चाहिए ताकि जोखिम कई के बीच फैल कर नियंत्रित हो जाए।

 

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