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क्या मुद्रा बाजार और पूंजी बाजार एक ही है? ये कैसे काम करते हैं? कुछ बातें जो दोनों के बारे में आपको जाननी चाहिए।

1993 में दुनिया की टॉप टेनिस खिलाड़ी 19 साल की मोनिका सेलेस को स्टेफी ग्राफ के एक सिरफिरे फैन ने हैमबर्ग में टेनिस कोर्ट पर ही चाकू मार कर घायल कर दिया था। इस घटना की वजह से 2 साल तक उनको टेनिस से दूर रहना पड़ा और एंडोर्समेंट से होने वाली संभावित कमाई, पुरस्कारों की धनराशि से भी वंचित होना पड़ा जो कि कई लाख डॉलर थी। इससे भी बुरा ये हुआ कि वो टूर्नामेंट आयोजित करने वालों के खिलाफ केस हार गईं और कानूनी लड़ाई के खर्च का बोझ भी उन पर पड़ा।   
सेलेस ने बाद में न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि इस दोहरे झटके के बाद उन्हें एहसास हुआ कि किसी की आमदनी का जरिया कभी भी बंद हो सकता है और भविष्य अनिश्चित हो सकता है। उसके बाद से ही उन्होंने अपने निवेश पर नजर रखना शुरू कर दिया। फरवरी 2001 में जब न्यूयॉर्क टाइम्स में इंटरव्यू प्रकाशित हुआ था तब सेलेस की कुल आर्थिक हैसियत 3.5 करोड़ डॉलर थी। इसमें से 44 फीसदी रकम शेयरों में निवेशित थी, 29 फीसदी निवेश टैक्स फ्री बॉन्ड में था, 8 फीसदी निवेश रियल एस्टेट में और बाकी रकम नकदी के तौर पर थी।  
सेलेस ने तब इंटरव्यू में कहा था कि “जो रकम शेयर बाजार में लगाती हूं उसे मुझे मेरे जीवनकाल तक में छूने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस बयान में सेलेस ने निवेश के स्प्रेड के बारे में समझाया था। जबकि आगे ये भी कहा था कि “ बॉन्ड के बिना भी मैं रह सकती हूं, मुझे ज्यादा सुरक्षित रहना पसंद है”

 
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मोनिका सेलेसे ने बस दो वाक्यों में ये समझा दिया कि वित्तीय मामलों में उनकी कितनी गहरी समझ है। ये ऐसे लोगों के लिए भी सबक हो सकता है जिन्होंने वित्तीय बाजार में हाल में कदम रखा हो। 

बाजार को लेकर संक्षिप्त विवरण 
बाजार वो जगह है जहां चीज़ों, सेवाओं और सूचनों की खरीद या बिक्री होती है। इसी तरह वित्तीय बाजार वो जगह है जहां खरीदारों और विक्रेताओं को खास किस्म के उत्पादों की खरीदार और विक्रेता मिलते हैं। जैसे शेयर और बॉन्ड जैसे वित्तीय उत्पाद, बीमा कवर, म्यूचुअल फंड जैसे ढेरों और उत्पाद। 
हालांकि ये आम बाजारों से इस मायने में अलग होता है कि इसके कामकाज पर निगरानी रखने वाला अलग रेगुलेटर होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें धोखाधड़ी की गुंजाइश ज्यादा होती है और ये बड़े पैमाने पर हो सकता है जिससे ज्यादा लोगों पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है। 


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आमतौर पर वित्तीय बाजार दो तरह के होते हैं-पूंजी बाजार और मुद्रा बाजार। लेकिन कई बार लोग वित्तीय बाजार और पूंजी बाजार को एक दूसरे का ही पर्याय समझते हैं। जबकि दोनों में काफी अंतर है। 

वित्तीय और पूंजी बाजार में क्या अंतर है?
वित्तीय बाजार में इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल हेजिंग के लिए किया जाता है- घाटे की भरपाई या मुनाफे को बढ़ाने के लिए निवेश
इनका इस्तेमाल सट्टेबाजी के लिए भी किया जा सकता है – यानि बाजार की उठापटक का फायदा उठाने के लिए जोखिम के साथ किया गया निवेश
इसका एक उदाहरण है फ्यूचर्स और ऑप्शंस में ट्रेडिंग, जो डेरिवेटिव के प्रचलित रूप हैं
पूंजी बाजार वो हैं जहां शेयर और बॉन्ड्स की ट्रेडिंग की जाती है
ये छोटे और संस्थागत निवेशकों की अतिरिक्त पूंजी को कंपनियों की ओर पहुंचाने में मदद करता है, ताकि पैसे का लाभकारी तरीके से इस्तेमाल हो सके

वित्तीय बाजार के प्रोडक्ट का इस्तेमाल जोखिम की भरपाई के लिए किया जाता है-नुकसान को कम करने या मुनाफा बढ़ाने के लिए। 
इसका इस्तेमाल सट्टेबाजी के लिए भी किया जा सकता है-मतलब रिटर्न कमाने के लिए निवेश के समय लिए गए जोखिम की भरपाई के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसका उदाहरण है फ्यूचर्स और ऑप्शंस में ट्रेडिंग जो कि डेरिवेटिव के दो सबसे प्रचलित रूप हैं। 
पूंजी बाजार में शेयर और बॉन्ड्स की खरीद बिक्री होती है। इससे छोटे और संस्थागत निवेशकों के पास पड़े सरप्लस पैसों को जरूरतमंद कंपनियों तक पहुंचाया जाता है ताकि कंपनियां इस रकम का बेहतर इस्तेमाल कर पाएं। 
पूंजी बाजार और मुद्रा बाजार में एक और अहम अंतर है कि पहला वाला नकदी का मार्केट है जबकि दूसरा वाला कर्ज लेने का मार्केट हैं।  

पूंजी बाजार

  • यहां, कंपनी के अच्छे प्रदर्शन से मुनाफा कमाने के उद्देश्य से निवेश किया जाता है
  • निवेशक (खरीदार) और जारीकर्ता (विक्रेता) कैश इंस्ट्रूमेंट्स में लेनदेन करते हैं, जैसे शेयर, म्युचुअल फंड्स, डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट्स, आदि

खरीदना और बेचना दोनों ही लंबी अवधि के निवेश के नजरिए से किया जाता है, जहां पैसे लंबी अवधि यानि 1 साल से ज्यादा अवधि के लिए लगाया जाता है।
पूंजी बाजार में सिक्योरिटीज बाजार और गैर-सिक्योरिटीज बाजार में शामिल होते हैं। 

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सिक्योरिटीज बाजार

सिक्योरिटीज बाजार के भी दो हिस्से हैं। पहला है प्राइमरी बाजार जिसमें आईपीओ, बॉन्ड्स, बुक बिल्डिंग, प्राइवेट प्लेसमेंट, आदि आते हैं। यहां, कंपनियां प्रस्तावित विस्तारण या सक्रिय पूंजी (वर्किंग कैपिटल) की जरूत पूरी करने के लिए पहली बार लोगों के लिए शेयर जारी करती हैं।

  • आईपीओ के लिए अर्जी देते वक्त संभावित निवेशक कंपनी के प्रमोटरों की विश्वसनीयता और प्रोजेक्ट की व्यवहार्यता की परख करते हैं।
  • अगर निवेशक पैसा लगाते हैं तो जिन कंपनियों ने शेयर जारी किए हैं वो अपने निवेशकों के साथ डिविडेंड के रूप में मुनाफा बांटती हैं।
  • जिन निवेशकों ने आईपीओ में पैसा लगाया है, वो शायद हमेशा के लिए शेयर अपने पास न रखना चाहें और वक्त-वक्त पर शेयर बेचें।
  • इस वजह से ही सेकेंडरी बाजार उभरकर आया है, जहां निवेशक अपने शेयर और बॉन्ड्स बेच सकता है।

सेकेंडरी बाजार में इक्विटी बाजार, डेट बाजार, कमोडिटी बाजार, फ्यूचर एंड ऑप्शंस बाजार शामिल हैं। 

  • यहां मुख्य खिलाड़ी स्टॉक ब्रोकर, डिपॉजिटरीज (बैंक, आदि) और कस्टोडियन और क्लीयरिंग मेंबर हैं, जो सुनिश्चित करते हैं कि लेनदेन सुरक्षित है। 
  • इसे स्पॉट बाजार और फॉर्वर्ड बाजार में बांटा जा सकता है, फॉर्वर्ड बाजार में दो हिस्से  हैं – फ्यूचर्स और ऑप्शंस/डेरिवेटिव

भारत में पूंजी बाजार का नियामक सेबी (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) है।


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गैर-सिक्योरिटीज बाजार

इस बाजार में म्युचुअल फंड्स, फिक्स्ड डिपॉजिट, सेविंग्स डिपॉजिट्स, डाक घर बचत और बीमा शामिल होता है। हालांकि, सरलता के लिए पूंजी बाजार में सिर्फ प्राइमरी बाजार और सेकेंडरी बाजार शामिल माना जाता है।

मुद्रा बाजार

  • डेट इंट्रूमेंट्स में कारोबार होता है, जहां समझा जाता है कि निर्गमन प्राधिकारी (सरकार या सरकारी एजेंसियां या फिर कंपनियां) को उनकी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए पूंजी उधार दी जाती है।
  • पूंजी की जरूरत तत्कालीन होती है, इसलिए उधार छोटी अवधि के लिए होता है। इसका मतलब है कि खरीदारी और बिक्री 1 साल या इससे कम अवधि के लिए की जाती है, उदाहरण के लिए 30 दिन से लेकर 1 साल के लिए।
  • कुछ मामलों में उधार को रातोंरात उतारने की भी शर्त होती है।

मुद्रा बाजार को जोखिम से बचने वाले निवेशक ज्यादा पसंद करते हैं, जो अपने मेहनत से कमाए पैसे को उतार-चढ़ाव भरे बाजार में नहीं लगाना चाहते हैं। मुद्रा बाजार में वो अपनी पूंजी छोटी अवधि के लिए सुरक्षित तरीके से निवेश कर पाते हैं, क्योंकि यहां इस्तेमाल किए जाने वाले वित्तीय इंट्रूमेंट्स पैसे के मूल्य को सुरक्षित रखते हैं। 

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मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में शामिल हैं:

  • सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट
  • कमर्शिल पेपर
  • रिपर्चेज एग्रीमेंट्स
  • बैंकर्स ऐक्सेप्टेंस 
  • ट्रेजरी बिल्स

इसके अलावा मुद्रा बाजार में 1 साल तक की छोटी अवधि वाले सिक्योरिटीज और वित्तीय इंट्रूमेंट्स का भी कारोबार होता है। सरकार द्वारा जारी किए गए ट्रेजरी बिल्स (टी-बिल्स) मैच्योरिटी के आधार पर मुद्रा बाजार या पूंजी बाजार में खरीदे-बेचे जा सकते हैं। 

मुद्रा बाजार का नियामक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) है।