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यदि आप अपने पीछे एक विरासत छोड़ कर जाना चाहते हैं तो आपके लिए वसीयत एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। लेकिन क्या आप वसीयत बनाने की प्रक्रिया के बारे में जानते हैं?

संपत्ति उत्तराधिकार: वसीयत बनाने के लिए यह जानना है ज़रूरी

जब आप अपनी वसीयत बनाने के बारे में सोचते हैं तो सबसे पहले एक वकील का ख्याल आता है, जो यह सुनिश्चित करे कि यह पूरी प्रक्रिया सावधानीपूर्वक उसकी देखरेख में पूरी हो सके। हालांकि यह ज़रूरी नहीं है कि इसे ऐसे ही किया जाए। वसीयत बनाना एक साधारण प्रक्रिया है। इसके लिए बस एक कागज़ और पेन की ज़रूरत पड़ती है।

 


दिल्ली के वकील और मेकिंग ए विल मेड ईज़ी नामक किताब के लेखक, वी.के. वर्मा के अनुसार ज़्यादातर भारतीय वसीयत नहीं बनाते हैं। हमारे यहां यह परंपरा है ही नहीं। एक पिछले इंटरव्यू में, वर्मा ने कहा था कि हर चार में से तीन भारतीय अपनी वसीयत नहीं बनाते हैं। इस मामले में भारतीय लोग बेहद सीधे-सादे और अनुभवहीन हैं।

 

 

वसीयत बनाने की प्रक्रिया

*वसीयत बनाने के मामले में आपको डरने, चिंता करने या उलझन में आने की कोई ज़रूरत नहीं है। हालांकि कुछ ऐसी चीज़ें ज़रूर हैं जिन पर वसीयत बनाने से पहले आपको ध्यान देना होगा।

 

 

*भारतीय कानून के तहत वसीयत लिखने का कोई तय फॉर्मेट (प्रारूप) नहीं है।

 


*यह मानते हुए कि वसीयतकर्ता ने अपनी संपत्ति कानूनी रूप से अधिग्रहण की है या उसे विरासत में मिली हैं, वसीयत बनाने के लिए बस एक पेन और कागज़ की ज़रूरत है।

 


*लिखित दस्तावेज़ पर यदि वसीयत बनाने वाले व्यक्ति यानि वसीयतकर्ता के हस्ताक्षर और साथ ही प्रमाण के लिए दो गवाहों के हस्ताक्षर भी हों तो उसे एक वैध वसीयत का दर्जा मिल जाता है।

 


*अगर वसीयतकर्ता लिखने में सक्षम नहीं है तो कोई और व्यक्ति उसके लिए यह कर सकता है। हस्ताक्षर के स्थान पर वसीयतकर्ता के अंगूठे का निशान लेना भी पर्याप्त होगा। और यहां भी दो गवाहों द्वारा प्रमाणित किए जाने के बाद इसे एक वैध दस्तावेज़ समझा जाएगा।

 


*गवाह भी हस्ताक्षर की जगह अपने अंगूठे का छाप लगा सकते हैं।

 

*न्यायालय हाथ द्वारा लिखी गई या होलोग्राफिक वसीयत को भी मान्यता देते हैं। इसके अलावा यह ज़रूरी नहीं कि वसीयतकर्ता एक स्टांप पेपर पर ही वसीयत लिखे। इसके लिए एक स्टेशनरी स्टोर से खरीदा गया साधारण A4 साइज़ का पेपर भी काफी होगा।

 

एक कानूनी दस्तावेज़ के रूप में, वसीयत उस श्रेणी के अंतर्गत आती है जिसे (पंजीकरण अधिनियम 1908 की धारा 18 के तहत) वैकल्पिक तौर पर रजिस्टर (पंजीकृत) किया जा सकता है। हालांकि इसे पंजीकृत या नोटराइज करवाने की कोई बाध्यता नहीं है।

 

एक वसीयतकर्ता अपनी वसीयत को कभी भी निरस्त कर सकता है या बदल सकता है। अगर ऐसा होता है तो चाहे पहली वसीयत पंजीकृत हो और दूसरी यानि संशोधित वसीयत पंजीकृत न हो फिर भी, कानून पहली वसीयत के सामने दूसरी को वरीयता देता है।

 


रजिस्टर करने के फायदे

हालांकि अपने जीवनकाल में बनाई गई वसीयत को रजिस्टर करवाने की कोई बाध्यता नहीं है लेकिन फिर भी ऐसा करने की सलाह दी जाती है।

 


इसके अतिरिक्त, दस्तावेज़ों के रजिस्ट्रेशन के लिए नामित प्राधिकारी यानि उप-आश्वासन के रजिस्ट्रार को यह संतुष्टि होनी चाहिए कि वसीयत को जमा करवाने वाला व्यक्ति ही वास्तव में वसीयतकर्ता या उसका एजेंट है।

 

हालांकि एक रजिस्टर्ड वसीयत को भी इस तर्क के साथ चुनौती दी जा सकती है कि उसमें वसीयतकर्ता द्वारा लिखे गए शब्दों को अनुचित प्रभाव के तहत लिखवाया गया है।

 


एक वसीयत को रजिस्टर करवाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि रजिस्ट्रेशन के बाद इसकी एक प्रति (और कभी-कभी वास्तविक प्रति भी) रजिस्ट्रार की सुरक्षा में रखी जाती है। इसकी वास्तविक प्रति को केवल रजिस्ट्रार, वसीयतकर्ता यदि वह जीवित है या फिर उसके एजेंट द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

 


वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद, वास्तविक दस्तावेज़ या उसकी प्रति रजिस्ट्रार की सुरक्षा में ही रहती है। आवेदन किए जाने पर वो आवेदक को इसकी प्रति लेने की अनुमति दे सकता है।

 


इससे इस बात की गारंटी हो जाती है कि वसीयतकर्ता द्वारा जीवनकाल में बनाई गई वास्तविक वसीयत के साथ उसकी मृत्यु के बाद छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। अगर यह संदेह होता है कि वसीयत के साथ छेड़छाड़ की गई है तो इसकी तुलना रजिस्ट्रार के दफ्तर में मौजूद वसीयत की कॉपी से की जा सकती है।

 


इसके अलावा, यदि मूल वसीयत आग या किसी दुर्घटना में नष्ट हो जाती है या चोरी हो जाती है, तो उसकी प्रति रजिस्ट्रार के दफ्तर से प्राप्त की जा सकती है।

 

 


खर्च और टैक्स

 


जब संपत्ति की योजना के लिए वसीयत तैयार करने की बात आती है तो एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। वह यह कि भारतीय कानून व्यवस्था विरासत पर किसी प्रकार का टैक्स नहीं लगाती है।

 


इसका मतलब है कि विरासत में मिली संपत्ति के लिए वारिस को टैक्स के रूप में कोई पैसा नहीं देना पड़ता। यही बात वसीयत के माध्यम से मिली अचल संपत्ति पर भी लागू होती है। चूंकि इसे खरीदा नहीं गया है बल्कि यह विरासत में मिली है इसलिए इसके लिए कोई स्टांप ड्यूटी देने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

 


इसी तरह, जन्म से जुड़े रिश्तेदारों को दिए जाने वाले उपहार भी विरासत कर से मुक्त होते हैं। रिश्तेदार को आयकर अधिनियम की धारा 56 में परिभाषित किया गया है। इसके अतिरिक्त, यदि रिश्तेदार के अलावा अन्य किसी व्यक्ति से 50 हज़ार रुपये से अधिक मूल्य की संपत्ति उपहार में मिलती है तो उस पर अन्य स्रोतों के तहत विरासत कर लगाया जाता है।

 

संपत्ति उत्तराधिकार: वसीयत बनाने के लिए यह जानना है ज़रूरी

 

यदि वसीयत बनवाने और रजिस्टर करवाने के लिए एक योग्य वकील की सेवा ली जाए तो आम तौर पर इसका खर्च 5000 से 8000 रुपये के बीच आता है। हालांकि यह वसीयतकर्ता किस शहर में रहता है और वकील की प्रतिष्ठा जैसे कुछ कारकों पर भी निर्भर करता है।

 


विरासत का कानून

 


भारत में विरासत कानूनों की बहुतायत है क्योंकि यह अक्सर धर्म-विशिष्ट होते हैं। इसके अलावा, यह सभी कानून विशेष रूप से, वसीयतनामा बनाए बिना व्यक्ति की मौत हो जाने की स्थिति को नियंत्रित करते हैं। 

 


हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदुओं (जैन, बौद्ध और सिखों समेत) पर लागू होता है। जबकि इसाइयों और “जनजातीय” रूप में पहचाने गए लोगों पर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू होता है। मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) मौजूद है।

 

 


अगर वसीयत मौजूद नहीं है

 


क्या होता है अगर किसी व्यक्ति कि मृत्यु वसीयत लिखने से पहले ही हो जाती है?उसकी संपत्ति किसे प्राप्त होती है?

 

ऐसी स्थिति में, विरासत में छोड़ी गई संपत्ति को कानूनी वारिसों के बीच में बराबर बांट दिया जाता है। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम में कानूनी वारिसों और वरीयता को परिभाषित किया गया है

 


इस कानून के तहत, पति/पत्नी और बच्चों को बराबर हिस्सा मिलता है। उदाहरण के लिए, एक बाल-बच्चों वाले शादीशुदा व्यक्ति की मौत होने पर उसके द्वारा बैंक में छोड़े गए फिक्स्ड डिपोज़िट को उस व्यक्ति की विधवा और बच्चों में बराबर बांट दिया जाता है।

 


लेकिन अगर खाते के लिए किसी व्यक्ति को नामांकित किया गया है तो बैंक मृत्यु प्रमाण पत्र मिलने पर सारी संपत्ति पहले नामांकित व्यक्ति को ट्रांसफर करेगा। इसके बाद वह उत्तराधिकर अधिनियम के तहत, कानूनी वारिसों को प्राप्त होती है।

 

अगर कोई नॉमिनी (नामांकित व्यक्ति) नहीं है तो वारिस को संपत्ति पर दावा करने के लिए अदालत से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करना होता है।

 


बैंक आम तौर पर जमा राशि/संपत्ति को सौंपने से पहले दावेदारों से मृत्यु प्रमाण पत्र की मूल प्रति और एक स्टैंडर्ड फॉर्मेट वाले एफिडेविट (हलफनामे) की मांग करते हैं।

 

 


अंतिमा बात: वैधता 

 


वसीयतों के बारे में, विवादास्पद रूप से सबसे महत्वपूर्ण सवाल है : वसीयत की वैधता की अवधि?

 

परिभाषा के अनुसार, वसीयत एक मृत व्यक्ति द्वारा अपने जीवनकाल में की गई घोषणा है जो उसकी मृत्यु के बाद प्रभावी होती है। इस प्रकार, सैद्धांतिक रूप से एक वसीयत, वसीयतकर्ता के निधन पर लागू होती है और अनंतकाल तक वैध रहती है।

 

हालांकि, एक वसीयत की वैधता को वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद लागू होने के 12 वर्षों के भीतर चुनौती दी जा सकती है।

 


एगॉन की आईविल को क्यों चुनें?

 


एगॉन की आईविल एक विस्तृत बुकलेट है जिसकी मदद से वसीयत बहुत जल्दी और आसानी से तैयार की जा सकती है। यह बुकलेट दिए गए कानूनी फॉर्मेट (प्रारूप) के अनुरूप आपको कॉन्टेंट में बदलाव करने की सहूलियत देती है। इस बुकलेट की सबसे अच्छी विशेषता यह है कि यह आपको संपत्ति और देनदारियों की सूची प्रदान करती है, जिससे वसीयत बनाने की पूरी प्रक्रिया बेहद आसान हो जाती है। यह पूरी तरह वैध है और कोई भी इसका उपयोग कर सकता है। इस बुकलेट के बारे में अधिक जानने के लिए, आप एगॉन की आईविल पर अक्सर पूछे जाने वाले सवालों का सेक्शन देख सकते हैं। इससे आपको तुरंत अपनी वसीयत बनाने के लिए विवरण भरने में मदद मिलेगी।

 

 

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