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बढ़ते निर्वाह खर्च और लंबे होते जीवन काल को देखते हुए रिटायरमेंट के लिए योजना बनाने का महत्व बढ़ता जा रहा है। धन-दौलत के साथ रिटायर होने का तरीका जानने के लिए ये लेख पढ़ें।

हम सब भविष्य के लिए योजना बनाने में विश्वास रखते हैं। चाहे योजना एक दिन के लिए हो या फिर छुट्टियों के लिए, पहले से ही योजना बना लेना बेहतर रहता है। लेकिन, जब बात रिटायरमेंट की योजना बनाने की आती है, तब कई लोग इसमें ढिलाई दिखाते हैं। इसलिए आश्चर्यजनक नहीं है कि एक रिटायरमेंट सर्वे के मुताबिक करीब 78 फीसदी भारतीयों ने अब तक अपने रिटायरमेंट की योजना बनानी शुरू भी नहीं की है।

 

इसके अलावा और भी बुरी खबर है। 2015 की ईवाई/सीआईआई रिपोर्ट के मुताबिक “साल 2010 में 60 साल की उम्र से ऊपर के लोगों का हिस्सा 8 फीसदी था, जो साल 2030 में बढ़कर 12 फीसदी होने का अनुमान है”। रिपोर्ट के आधार पर ये माना जा सकता है कि रिटायर हुए कुल लोगों में से बड़ी संख्या को दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि उन्होंने ठीक से रिटायरमेंट के लिए योजना नहीं बनाई थी।

हालांकि, रिटायरमेंट वित्तीय योजना का सबसे दूर का लक्ष्य है, लेकिन इसे अनदेखा करना समझदारी नहीं है। बल्कि, छोटी अवधि के लक्ष्यों के मुकाबले इस दूर के लक्ष्य के लिए जल्दी योजना बनाना आसान काम है। जीवन के कमाई वाले दौर में रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी के लिए योजना बनाना क्यों जरूरी है ये हम आपको बताते हैं।

लंबा होता जीवन काल

जीवन काल लंबा होने से एक व्यक्ति की जिंदगी का कमाई रहित दौर बढ़ता जा रहा है। 30 साल तक कामकाज करने के बाद 60 साल की उम्र में रिटायर होने वाला व्यक्ति आराम से 30 साल या इससे ज्यादा लंबा जी सकता है। इसका मतलब है कि कमाई वाले 30 सालों से बिना कमाई वाले 30 सालों की भरपाई करनी होगी। दरअसल ये रिटायरमेंट योजना का 30-30 नियम है।

वक्त से पहले रिटायरमेंट

ज्यादा से ज्यादा लोग जल्दी रिटायर होने की योजना बना रहे हैं। लेकिन, इसके लिए बड़ी राशि की जरूरत पड़ेगी। बैंकबाजार.कॉम के कैटेगरी हेड – सेविंग्स एंड इंवेस्टमेंट्स, अजित नरसिम्हन का कहना है कि “रिटायरमेंट की उम्र का अनुमान लगाएं। सिर्फ इसलिए कि हमारे पिता और दादा 60 साल की उम्र में रिटायर हुए थे, इससे ये गारंटी नहीं है कि हम लोग भी 60 साल की उम्र में ही रिटायर होंगे। ध्यान में रखें कि नौकरी निर्माण और नौकरियों की मांग-आपूर्ति अहम तत्व हैं। दिन-ब-दिन कंपनियां और नौकरियां युवाओं के लिए उपयुक्त होती जा रही हैं। संभव है कि हमें शायद 45 या 50 साल की उम्र में ही रिटायर होना पड़े। इसलिए, रिटायरमेंट की उम्र को लेकर यर्थाथवादी होना जरूरी है।“

निर्वाह खर्च

साल दर साल निर्वाह खर्च बढ़ता चला जा रहा है। इसपर नजर डालिए: आज का 50,000 रुपये का मासिक घरखर्च 25 साल के बाद बढ़कर करीब 1.7 लाख रुपये (3.5 गुना) हो जाएगा, अगर माने की सालाना महंगाई दर 5 फीसदी रहती है। महंगाई का असर रिटायर होने के बाद भी पड़ेगा और बल्कि कमाई न होने की वजह से इसका ज्यादा असर नजर आएगा। नरसिम्हन के मुताबिक, “रिटायरमेंट के लिए गणना करते वक्त 8 फीसदी की सालाना महंगाई दर को मानकर चलें। ऊंची दर का अनुमान रखना बेहतर रहेगा। अगर आपके अनुमान से महंगाई दर कम रहती है तो आपके पास ज्यादा पूंजी रहेगी। लेकिन, अगर आपका महंगाई दर का अनुमान काफी कम हो, तो आप बड़ी मुश्किल में पड़ सकते हैं।“

हमारा इरादा आपको डराने का नहीं है, बस हम चाहते हैं कि आप जाने की कैसे महंगाई दर आपकी पूंजी पर असर डालती है। अगर किसी व्यक्ति 1 करोड़ रुपये की पूंजी पर्याप्त लगती है, तो देखते हैं कि 5 फीसदी की महंगाई दर के साथ 15 साल के बाद इसका वास्तविक मूल्य कितना रह जाता है। 1 करोड़ रुपये का वास्तविक मूल्य घटकर सिर्फ 48 लाख रुपये रह जाएगा।

देरी का मूल्य

रिटायरमेंट के लिए निवेश में देरी करने का आपको बड़ा मूल्य चुकाना पड़ सकता है। इसके दो पहलू हैं – पहला, जल्दी निवेश करने वाले निवेशकों को कम पैसे लगाने पड़ते हैं और दूसरा, देर से निवेश शुरू करने वाले निवेशकों के मुकाबले जल्दी निवेश करने वालों को कंपाउंडिंग का ज्यादा फायदा मिलता है। लाभ म

सारणी से पता चलता है कि जल्दी निवेश शुरू करने वाले निवेशक 50-75 फीसदी कम बचत के साथ उतनी ही पूंजी जोड़ सकता है। साथ ही, पता चलता है कि पूंजी का करीब 90 फीसदी आय से आता है, बल्कि देर से निवेश शुरू करने वालों के लिए ये आंकड़ा घटकर 75-80 फीसदी हो जाता है। ये कंपाउंडिंग का असर है।

जरूरतों का अनुमान

रिटायरमेंट के लिए बचत शुरू करने से पहले आप ये अनुमान लगाएं कि आपको कितनी पूंजी की जरूरत पड़ेगी। जबतक आपको पता नहीं है कि कितनी पूंजी की जरूरत है, तबतक निवेश शुरू न करें।

सबसे पहले आप मौजूदा लागत पर मासिक खर्चों को जोड़ें। अनुमान करें कि महंगाई दर 5 फीसदी रहेगी, रिटायर होने में बाकी सालों के लिए अपने मासिक खर्चों की महंगाई के आधार पर गणना करें। इससे आपको रिटायरमेंट के बाद के सालों के लिए महंगाई की वजह से बढ़े हुए मासिक खर्च का अंदाजा मिलेगा। अब उल्टा हिसाब लगाइए। अनुमान लगाइए कि आपको मौजूदा समय से कितनी बचत करनी होगी ताकि आपके पास रिटायरमेंट के बाद बढ़े हुए मासिक खर्च को पूरा करने के लिए पर्याप्त पूंजी इकट्ठी हो सके।

कितना निवेश करना है ये जानने के लिए आप इस रिटायरमेंट प्लानिंग कैलकुलेटर का इस्तेमाल करें।

ध्यान रखें

रिटायरमेंट के बाद जरूरी नहीं है कि आपको खर्चों में कमी आए। कुछ बातों को लेकर खर्च कम हो सकता है, लेकिन रिटायरमेंट के बाद वहीं स्वास्थ्य और यात्रा संबंधित खर्चों में बढ़ोतरी हो सकती है। नरसिम्हन का कहना है कि, “जीवनशैली और खर्च में कमी आने का अनुमान न लगाएं। इंसानों के लिए बदलाव को स्वीकार करना मुश्किल होता है। ये और भी ज्यादा मुश्किल होता है जब मुद्दा जीवन स्तर को बढ़ाने के बजाय कम करना होता है। इसके अलावा, उम्र बढ़ने के साथ अतिरिक्त जीवनशैली का खर्च जुड़ने की भी संभावना रहती है।“

इसलिए, गणना के लिए मौजूदा मासिक खर्च को ध्यान में रखना बेहतर रहता है। साथ ही, रिटायरमेंट के बाद की महंगाई भी चिंता का विषय है। राइट हराइजंस के सीईओ और फाउंडर, अनिल रेगो के मुताबिक, “रिटायरमेंट के बाद के मासिक खर्च की गणना के लिए महंगाई दर को ध्यान में रखना चाहिए और रिटायरमेंट के बाद महंगाई के आधार पर हर साल इस आंकड़े में बढञोतरी होगी। यानि ये आंकड़ा हर साल बढ़ता चला जाएगा।“

रिटायरमेंट के बाद के सालों में चिकित्सीय खर्चों में बढ़ोतरी को भी ध्यान रखना जरूरी है। नरसिम्हन के मुताबिक, “इलाज की लागत बड़ा खर्च है, खासतौर पर रिटायरमेंट के बाद और बड़ी बीमारी की संभावना के लिए तैयार रहने के लिए आपको अपने और अपने जीवनसाथी के लिए व्यापक स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी लेनी होगी। ये काफी अहम बात है कि क्योंकि अनुपयोगी पॉलिसी या स्वास्थ्य बीमा के अभाव से आपकी रिटायरमेंट योजना असफल हो जाएगी, क्योंकि इलाज की जरूरत और लागत का अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल काम है।

निवेश विकल्पों का चुनाव

जल्द निवेश शुरू करने के साथ ही, सही निवेश विकल्पों का चुनाव करना भी अहम है। रेगो का कहना है कि, “आमतौर पर लोग जोखिम उठाने की क्षमता और निवेश विकल्पों के चुनाव के लिए प्रचलित धारणा (उम्र पर आधारित) का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, इसे सभी लोगों पर एक जैसा लागू नहीं किया जा सकता है, क्योंकि ऐसा भी हो सकता है कि बड़ी उम्र का निवेशक ज्यादा जोखिम उठाना चाहता हो और ज्यादातर शेयरों में निवेश करना पसंद करता हो।“

जब आपके रिटायरमेंट में कम से कम 10 साल का वक्त बाकी हो, तब शेयरों में निवेश करें। अध्ययनों से पता चला है कि लंबी अवधि में दूसरे निवेश विकल्पों (जिसमें सोना, डेट और रियल एस्टेट शामिल है) के मुकाबले शेयरों का ऊंची महंगाई दर समायोजित वास्तविक रिटर्न सबसे ज्यादा रहा है। रिटायरमेंट के लिए योजना बनाते वक्त डेट-एसेट के बीच तालमेल को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इकट्ठी हुई पूंजी को सुरक्षित रखने के लिए, रिटायरमेंट के करीब आने पर जोखिम कम करने के लक्ष्य के साथ शेयरों के बजाय कम उतार-चढ़ाव वाले डेट में निवेश करना शुरू करना चाहिए।

रिटायरमेंट पोर्टफोलियो का निर्माण

हर निवेशक के लिए कुल निवेश में शेयरों की हिस्सेदारी एक समान नहीं हो सकती है। ये निवेशक की उम्र और जोखिम उठाने की क्षमता पर निर्भर करता है। युवाओं के पास ज्यादा वक्त रहता है और वो शुरूआत में शेयरों में ज्यादा निवेश करने का फैसला कर सकते हैं। नरसिम्हन के मुताबिक, “ आम धारणा है कि रिटायरमेंट के लिए जितना ज्यादा वक्त हो, उतना ज्यादा शेयरों में निवेश करना चाहिए। 40 साल से कम उम्र के व्यक्तिओं को अपने निवेश का 80 फीसदी शेयरों में लगाना चाहिए और ये माना जा रहा है कि इन व्यक्तिओं की आय का कम से कम 40 फीसदी हिस्सा निवेश विकल्पों पर खर्च हो रहा है। मेरा मानना है कि इससे कम निवेश करने पर रिटायरमेंट के बाद पर्याप्त पूंजी नहीं इकट्टी की जा सकती है।“

रिटायरमेंट के लिए निवेश करने के लिए एसआईपी का तरीका अपनाएं। रेगो के मुताबिक, “लंबी अवधि के लिए पूंजी जुटाने के लिए नियमित रूप से निवेश और लंबी समय के लिए निवेश बनाए रखना योग्य है। आदर्शरूप में लंबी अवधि में पूंजी इकट्ठी करने के लक्ष्य के साथ निवेश करने के लिए एसआईपी सबसे बेहतर तरीका है।“ शेयरों में भारी निवेश वाले रिटायरमेंट पोर्टफोलियो का लार्ज कैप, मिड कैप और स्मॉल कैप में विविधीकरण करना जरूरी है। उम्र बढ़ने के साथ, शेयरों में निवेश को कम करके डेट एसेट में पैसा लगाया जा सकता है। ध्यान रखें कि नौकरीपेशा लोग अपनी आय का एक हिस्सा प्रोविडेंट फंड में लगाते हैं जो डेट एसेट है। 

चिंतामुक्त रिटायरमेंट के लिए कदम

  • रिटायरमेंट के लिए जल्दी पैसा बचाना शुरू करें।
  • रिटायरमेंट की पूंजी जुटाने के लिए मासिक बचत का हिसाब लगाएं।
  • रिटायरमेंट के लिए अलग पोर्टफोलियो बनाएं और उसमें निवेश करने के लिए पैसे अलग रखें।
  • लक्ष्य हासिल होने में 3 साल की अवधि बाकी रहने तक शेयरों में ज्यादा निवेश करें।
  • एसआईपी तरीका अपनाएं और संभव हो तो रिटायरमेंट करीब आने पर एसआईपी की राशि बढ़ाएं।
  • रिटायरमेंट में 3 साल बाकी रहने पर अपने निवेश का जोखिम कम करें।

निष्कर्ष में

क्रिकेट में खेल के शुरुआती दौर में रन बनाने से जरूरी रन-रेट पर काबू पाया जा सकता है। वैसे ही, अगर आप जल्दी बचत करना शुरू करते हैं तो देर से निवेश करने वालों के मुकाबले आपके लिए रिटायरमेंट की पूंजी इकट्ठी करने के लिए लगने वाला बचत की राशि कम रहेगी। नरसिम्हन के मुताबिक, “जल्दी शुरू करें। आदर्शरूप से आपको नौकरी के पहले साल से ही रिटायरमेंट के लिए बचत की शुरूआत कर देनी चाहिए। रिटायरमेंट के लिए योजना बनना अहम है और भारत के युवा इसे प्राथमिकता देकर फायदे में रख सकते हैं।“