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जीएसटी लागू होने से ये कुछ वित्तीय उत्पाद और सेवाएं महंगी हैं।

विलियम शेख्सपेयर ने कहा है, “पूरी दुनिया एक रंगमंच है” और ये सही भी है। चाहे कुछ भी हो जाए, दुनिया चलती रहती है।

वित्तीय दुनिया भी इससे अलग नहीं है। ये ऐसा रंगमंच है जहां नए विकास और कार्य लगातार बिना रुके चलते रहते हैं। शायद ही यहां सन्नाटा दिखता हो कभी। इस साल की शुरुआत में ही बजट ने कोलाहल मचा दिया। हाल ही में, गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) लागू होने पर लोगों की नजर बनी हुई है। जीएसटी काउंसिल ने उत्पादों और सेवाओं पर टैक्स दर तय कर दू है, जिसमें वित्तीय सेवाएं और उत्पाद भी शामिल हैं। इनपर टैक्स 15 फीसदी से बढ़कर 18 फीसदी हो गया है।

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हम आपको ऐसे पांच वित्तीय उत्पादों और सेवाओं के बारे में बताएंगे जिनपर जीएसटी का असर होगा।

बैंकिंग सेवाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को डिजिटल देश में बदलना चाहते हैं और उनकी इस लक्ष्य को मोबाइल और ई-बैंकिंग के जरिए हासिल करने की योजना है। क्या उनके इस सपने पर जीएसटी का असर पड़ेगा? जरूरी नहीं है। टैक्स में 3 फीसदी की बढ़ोतरी से ग्राहकों को मिलने वाली कई बैंक सेवाएं महंगी होंगी। लेकिन, ये बढ़त इतनी ज्यादा नहीं होगी जिसका आम आदमी की बैंक सेवाएं लेने की आदत पर असर पड़े।

बैंक सेवाएं जिनपर टैक्स लगेगा

  • बैंक
  • एटीएम से लेन-देन
  • फंड ट्रांसफर
  • लोन की प्रोसेसिंग फीस
  • क्रेडिट कार्ड भुगतान

बीमा सेवाएं

जीएसटी की 18 फीसदी की नई दर बीमा क्षेत्र पर भी लागू होगी। मौजूदा टैक्स नियमों के तहत शुद्ध जीवन बीमा पॉलिसी के पूरे प्रीमियम पर सर्विस टैक्स लगता है। वहीं, यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप) और एंडाउमंट प्लान के जुड़े शुल्कों पर ही सर्विस टैक्स लगता है। फिलहाल यूलिप पर 14 फीसदी टैक्स लगता है, लेकिन अब ये बढ़कर 18 फीसदी हो जाएगा। पारंपरिक बचत और निवेश प्लान पर पहले साल में टैक्स 3.75 फीसदी की बजाय 4.5 फीसदी लगेगा। दूसरे साल में टैक्स मौजूदा 1.88 फीसदी से बढ़कर 2.25 फीसदी हो जाएगा। वहीं, टर्म प्लान पर टैक्स 15 फीसदी से बढ़कर 18 फीसदी होगा।

हालांकि, उम्मीद की जा रही है कि इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा ग्राहकों तक पहुंचाया जा सकता है। बाकी बीमा जैसे स्वास्थ्य और मोटर बीमा पॉलिसी के प्रीमियम में भी बढ़ोतरी होगी। बीमा पॉलिसी महंगी होने की आशंका है। लेकिन, इसका असर भी लोगों की बीमा खरीदने की आदत पर नहीं पड़ने की संभावना है, क्योंकि वित्तीय योजना में बीमा का अहम स्थान है।

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म्यूचुअल  फंड्स

निवेशक की अनुमानित म्यूचुअल  फंड की कुल लागत, सभी तरह के शुल्क शामिल करके, को टोटल एक्सपेंस रेश्यो (टीईआर) कहा जाता है। जहां ज्यादातर शुल्कों पर सर्विस टैक्स लगता है, वहीं टीईआर पर सीमा लगी हुई है। नई टैक्स दर की वजह से टीईआर के घटकों की लागत बढ़ सकती है। अगर इससे टीईआर तय सीमा के बाहर जाती है तो एसेट मैनेजमेंट कंपनी पर मैनेजमेंट खर्च कम करने की जिम्मेदारी आएगी। 20 लाख रुपये तक कमाने वाले म्यूचुअल  फंड डिस्ट्रिब्यूटर्स पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। बाकी के लिए टैक्स दर 15 फीसदी से बढ़कर 18 फीसदी हो जाएगी। निवेशकों के लिए म्यूचुअल  फंड की लागत 0.04-0.05 फीसदी बढ़ सकती है। यानि, जीएसटी का म्यूचुअल  फंड निवेश पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा।

स्टॉक ब्रोकरेज

जीएसटी का असर शेयर बाजार ट्रेडिंग पर भी दिखेगा। लेकिन, नई टैक्स दर का कितना असर पड़ेगा ये निवेश रकम पर निर्भर करेगा। ट्रेडिंग के लिए आप जो ब्रोकरेज देते हैं उसपर टैक्स बढ़ेगा। ज्यादातर कुल निवेश का काफी छोटा हिस्सा ब्रोकरेज का होता है और 10,000 रुपये तक की ट्रेडिंग पर 1 फीसदी तक ब्रोकरेज लगता है।

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सोना

सोना भी जीएसटी की पहुंच से नहीं बच पाया। काउंसिल ने सोने पर टैक्स दर 2 फीसदी से बढ़ाकर 3 फीसदी की है। इसके चलते सोना महंगा होने से लोग गोल्ड बॉन्ड्स में निवेश करना पसंद कर सकते हैं। बॉन्ड्स खरीदने का ये फायदा भी है कि इनपर ब्याज मिलता है। जीएसटी का गहने बनाने के शुल्क पर भी असर पड़ेगा। पहले इस तरह की सेवाएं टैक्स के दायरे से बाहर थीं। लेकिन, जीएसटी के तहत गहने बनाने के शुल्क पर 18 फीसदी टैक्स लगेगा। यानि, जीएसटी लागू होने के बाद सोना खरीदने या सोने के गहने बनवाना महंगा पड़ सकता है।

आखिर में

वित्तीय सेवाओं पर टैक्स दर बढ़ने से ये महंगी हो सकती हैं। हालांकि, इसका असर मांग पर कितना पड़ेगा ये निवेशकों और वित्तीय उत्पादों और सेवाओं पर निर्भर करेगा। 

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