क्या जीएसटी आपके घर के सपने को हकीकत में बदलेगा?

जीएसटी लागू होने के बाद घर खरीदारों को राहत मिल सकती है। तो नए टैक्स सिस्टम में क्या होंगे बदलाव?

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आईटी अधिकारी अश्विन चंद्रा कुछ वक्त से मुंबई में घर खरीदने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने कई निर्माणाधीन प्रोजेक्ट देखे और कुछ डेवेलपरों से बात भी की, लेकिन उनको नहीं लगा कि तब घर खरीदने का सही वक्त था। अपना घर खरीदना अश्विन का सपना सच होने के बराबर होगा। लेकिन वो कुछ बातों लेकर चिंता में है। जैसे, गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) लागू हो गया है, तो क्या जुलाई के बाद घर खरीदना सही फैसला होगा?

अश्विन जैसे ही कई घर खरीदार हैं जिनके मन में ये सवाल है। विमुद्रीकरण के बाद प्रॉपर्टी के दाम में भारी गिरावट आई है। अब जीएसटी को स्वतंत्र भारत के इतिहास में हुए सबसे बड़े अप्रत्यक्ष कर सुधार बताया जा रहा है। लेकिन, ये किसी को नहीं पता है कि इससे रियल एस्टेट को फायदा मिलेगा या नहीं। जीएसटी पूरी तरह लागू होने के बाद इस बात को लेकर सफाई मिलेगी। लेकिन, ऐसे कई संकेत मिल रहे हैं जिससे घर खरीदने वालों को फायदा होने की संभावना लग रही है। वहीं, कुछ बातों को लेकर चिंता भी बन रही है। देखते हैं कि कौन सी बातों का सबसे ज्यादा असर होगा।

 

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12 फीसदी जीएसटी

निर्माणाधीन और नई निर्मित प्रॉपर्टी जिसे सर्टिफिकेट ऑफ ऑक्यूपेंसी (ओसी) या कंप्लीशेन सर्टिफिकेट नहीं मिला है उसपर 12 फीसदी जीएसटी लगेगा, जो पहले के 4.5 फीसदी सर्विस टैक्स के मुकाबले काफी ज्यादा है। ओसी एक ऐसा दस्तावेज है जिसे निर्माण कार्य के पूरा होने के बाद स्थानीय सरकारी एजेंसी या योजना प्राधिकारी जारी करता है और ये निर्माण अनुपालन और संबंधित कानूनों के सबूत के तौर पर काम करता है।

तो क्या इसका मतलब है कि प्रॉपर्टी की कीमतों में बढ़ोतरी होगी? इसका जवाब है नहीं, बिल्कुल नहीं। क्योंकि जीएसटी के तहत मौजूदा 6 टैक्स आ जाएंगे, जिसमें कच्चे माल पर एक्साइज, एंट्री टैक्स, वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) शामिल हैं और जिनका योग 12 फीसदी से ज्यादा होता है। हालांकि, जीएसटी रेडी-टू-मूव प्रॉपर्टी पर लागू होगा। इसकी वजह से माना जा रहा है कि खरीदार अब नई प्रॉपर्टी को तरजीह देंगे।

घर खरीदार को फिलहाल करीब 11 फीसदी अप्रत्यक्ष कर के तौर पर देना पड़ता है। जैसे, निर्माण में काम आने वाले कच्चे माल पर 12-14 फीसदी वैट लगता है। अब इसपर 12 फीसदी जीएसटी लगेगा। सभी टैक्स का बोझ ग्राहक पर पड़ता है जिसे प्रॉपर्टी के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है। हालांकि, जीएसटी के तहत आधे दर्जन टैक्स के ऊपर लगने वाला टैक्स कम होने से ग्राहकों को राहत मिलेगी।

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हालांकि, सीमेंट कीमतों में बढ़ोतरी से टैक्स बचत का फायदा ज्यादा नहीं मिल पाएगा। किसी भी हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए सीमेंट बहुत अहम है और जीएसटी के तहत इसपर 28 फीसदी टैक्स लगेगा। ये हाउसिंग सेक्टर के लिए बड़ा झटका है क्योंकि इससे प्रॉपर्टी की कीमतों में बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा सिरामिक टाइल्स, पेंट, वॉल फिटिंग, आदि भी महंगे होंगे, क्योंकि इनपर मौजूदा 20-25 फीसदी टैक्स के बदले 28 फीसदी जीएसटी लगेगा।

 

मुख्य निर्माण-कार्य सामान पर जीएसटी

सीमेंट पर टैक्स औसत 20-24 फीसदी से बढ़कर 28 फीसदी

सैंड लाइम और फ्लाइ ऐश ब्रिक पर 12 फीसदी जीएसटी लगेगा, वहीं बिल्डिंग और फॉसिल मील्स ब्रिक पर 5 फीसदी टैक्स लगेगा

खंबों और लोहे के सरियों पर 18 फीसदी टैक्स लगेगा, जो पहले के 20 फीसदी के मुकाबले थोड़ा कम है

सिरामिक टाइल्स, पेंट, प्लास्टर, वॉल फिटिंग्स, वॉल फिटिंग और वॉलपेपर पर टैक्स 20-25 फीसदी से बढ़कर 28 फीसदी

निर्माणाधीन प्रोजेक्ट के लिए आईटीसी से टैक्स बोझ कम

घर खरीदने वालों को इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) से भी फायदा मिलने की उम्मीद है। बिल्डर निर्माण में काम आने वाले सामान पर अदा किए गए एक्साइज ड्यूटी और दूसरे क्रेंदीय करों के बदले में रिफंड ले सकेंगे। सरकार के निर्देशों के मुताबिक इसका फायदा ग्राहकों को जरूर दिया जाना चाहिए। घर खरीदारों के लिए इसका मतलब है प्रॉपर्टी की कीमतों में कमी और लोन की किश्तों में कम बोझ। हालांकि, इसका फायदा निर्माणाधीन प्रोजेक्ट को ही मिलेगा और डेवेलपर मानते हैं कि घर खरीदारों के लिए इसका लाभ बहुत कम होगा।

क्या नहीं बदलेगा?

अभी घर खऱीदारों को प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन के लिए स्टांप ड्यूटी अदा करनी पड़ती है। ये फिलहाल प्रॉपर्टी के मूल्य के 6-8 फीसदी से बराबर होती है और अलग-अलग राज्यों के हिसाब से इसकी दर बदलती रहती है। ये रकम राज्य सरकार के खजाने में जाती है। शायद यही वजह है कि राज्यों ने स्टांप ड्यूटी को जीएसटी शामिल करने के विचार को खारिज कर दिया। जीएसटी के बाद इस लागत में कोई बदलाव नहीं होगा और घर खरीदारों को स्टांप ड्यूटी चुकानी होगी।

सरकार के अन्य कदम

ये देखने की बात होगी कि जीएसटी से घर खरीदारों को कितना फायदा होगा। रियल एस्टेट इंडस्ट्री विमुद्रीकरण के बाद काफी मुश्किल भरे वक्त से गुजर रही है और जिससे प्रॉपर्टी की कीमतें घट रही हैं।

रियल एस्टेट रेगुलेटरी एक्ट (रेरा) के तहत बिल्डर के लिए अपने प्रोजेक्ट रजिस्टर कराना जरूरी है। रेरा के नियमों के तहत बिल्डर को कारपेट एरिया के हिसाब से अपार्टमेंट का साइज बताना जरूरी है। ऐसे चालू प्रोजेक्ट जिन्हें कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं मिला हो उनके बिल्डर या प्रमोटर के लिए अलग से प्रोजेक्ट का खाता रखना जरूरी है। बिल्डर को घर खरीदारों से प्रोजेक्ट के लिए मिली कुल राशि का 70 फीसदी इस खाते में अलग रखना होगा। ये रजिस्ट्रेशन की अर्जी देने के तीन महीनों के अंदर करना होगा। सरकार चाहती है कि बिल्डर एक प्रोजेक्ट का पैसा दूसरे प्रोजेक्ट नहीं लगाए, ताकि वक्त पर प्रोजेक्ट पूरा हो सके।

वहीं, जीएसटी पूरी तरह से लागू होने के बाद रियल्टी सेक्टर का कामकाज और सुधरेगा। सरकार की मंशा है कि बिना रजिस्ट्रेशन वाले डीलरों से सौदे नहीं किए जाएं। इसलिए सरकार ने रकम पाने वालों पर रिवर्स चार्ज लगाया है। इससे खरीदार की कंप्लायंस की लागत बढ़ेगी।

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निष्कर्ष

ये देखने की बात होगी की घर खरीदारों को जीएसटी से कितना फायदा मिलता है। इतने बड़े पैमाने पर इसे लागू करने से शुरुआती महीनों में कुछ दिक्कतें आ सकती हैं। इसके असर से बड़े शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतें कुछ बढ़ सकती हैं। याद रखिए कि घर खरीदारों को जीएसटी के तहत कुल 17-18 फीसदी टैक्स भरना पड़ सकता है। (12 फीसदी जीएसटी प्लस स्टांप ड्यूटी), जो कि एक मौजूदा 11-18 फीसदी के स्तर के मुकाबले काफी ज्यादा है। लेकिन बिल्डर चाहें तो इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा ग्राहकों को दे सकते हैं। या कम से कम से कम सरकार तो बिल्डर को ये फायदा देने के लिए निर्देशित करती है। इसमें संदेह नहीं कि जीएसटी से रियल एस्टेट सेक्टर में ज्यादा जवाबदेही आएगी और प्रोजेक्ट के पैसे कहां से आए और कहां गए इसका पता लगाना आसान होगा। इसलिए खरीदार उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार घर खरीदने की प्रक्रिया आसान बनाएगी साथ ही उम्मीद है कि ग्राहकों की जेब पर बोझ घटेगा।

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